छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच पर मंडराया अस्तित्व संकट: निर्वाचन आयोग ने कारण बताओ नोटिस जारी, पंजीकरण रद्द होने की आशंका

रायपुर। कभी छत्तीसगढ़ की पहली क्षेत्रीय पार्टी मानी जाने वाली छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच अब अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रही है। भारत निर्वाचन आयोग ने मंच सहित तीन पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आरोप है कि इन दलों ने बीते तीन वर्षों (2021-22, 2022-23 और 2023-24) के वार्षिक लेखा-परीक्षित खाते और चुनावी व्यय रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत नहीं किए। आयोग ने स्पष्ट किया है कि 9 अक्टूबर 2025 तक हलफनामा और दस्तावेज जमा नहीं करने पर पार्टी का पंजीकरण रद्द किया जा सकता है। सुनवाई इसी दिन होगी।

स्वाभिमान मंच का सफर और पतन

छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच का गठन 10 अगस्त 2008 को दुर्ग के दिग्गज नेता और भाजपा के पहले प्रदेशाध्यक्ष रहे स्व. ताराचंद साहू ने किया था। भाजपा से निष्कासन के बाद उन्होंने कांग्रेस और भाजपा के बीच तीसरे विकल्प के तौर पर इस पार्टी को खड़ा किया। 2008 विधानसभा चुनाव में सभी 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, हालांकि सफलता नहीं मिली।2009 लोकसभा चुनाव में साहू ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दुर्ग से 2.64 लाख वोट पाकर अपनी जमीनी पकड़ दिखाई। लेकिन 2012 में उनके आकस्मिक निधन के बाद मंच संभल नहीं पाया। उनके बेटे दीपक साहू ने 2014 में पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया। इसे ‘घर वापसी’ कहा गया, लेकिन इससे संगठन दो हिस्सों में बंट गया। एक धड़ा भाजपा में, तो दूसरा अजीत जोगी की जनता कांग्रेस (J) के साथ चला गया। कुछ नेताओं ने आम आदमी पार्टी से जुड़ने की कोशिश भी की, पर सफलता नहीं मिली। आज हालत यह है कि मंच केवल कागजों पर बचा है। न जनाधार, न सक्रिय संगठन। अब निर्वाचन आयोग का नोटिस इसकी बची-खुची पहचान पर अंतिम प्रहार माना जा रहा है।

अन्य दो पार्टियों पर भी संकट

स्वाभिमान मंच के साथ ही भ्रष्टाचार मुक्ति मोर्चा और पिछड़ा समाज पार्टी यूनाइटेड को भी नोटिस दिया गया है। पिछड़ा समाज पार्टी यूनाइटेड का दावा है कि उसके 50 हजार सदस्य हैं और संगठन का विस्तार 10 राज्यों तक है। पार्टी ने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव भी लड़े हैं।

क्यों डगमगा गया मंच का आधार?

  • करिश्माई नेतृत्व का अभाव (ताराचंद साहू के निधन के बाद)
  • आंतरिक कलह और गुटबाजी
  • स्थायी वैचारिक एजेंडे की कमी
  • भाजपा और कांग्रेस के दबदबे के बीच तीसरी ताकत न बन पाना

अब सबकी निगाहें 9 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि स्वाभिमान मंच का राजनीतिक अस्तित्व बचेगा या यह सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा।

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