जामगांव (आर)।छत्तीसगढ़ की शिरडी के नाम से प्रसिद्ध भगवान भाठागांव स्थित मंदिर वाले बाबा की महिमा और चमत्कार आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं। ग्रामीणों के अनुसार बाबा के समाधि स्थल पर आज भी अनेक अलौकिक घटनाएं देखने-सुनने को मिलती हैं। कभी समाधि में रखा झूला स्वयं झूलने लगता है तो कभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होने की कथाएं श्रद्धा के साथ साझा की जाती हैं। ग्रामीणों एवं बाबा के वंशजों के अनुसार मंदिर वाले बाबा का जन्म इसी ग्राम में एक ऋषि के आशीर्वाद से हुआ था। कहा जाता है कि बाबा के माता-पिता श्री बैजनाथ एवं माता सुखवंतीन बाई आदिवासी थे और संतान न होने से दुखी रहते थे। उन्होंने एक तालाब निर्माण का संकल्प लिया और अथक परिश्रम किया। उसी दौरान एक अवघड बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया, जिसके फलस्वरूप सन् 1780 में, लगभग 60 वर्ष की आयु में, उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस बालक का नाम लच्छण सिंह रखा गया, जो आगे चलकर मंदिर वाले बाबा के नाम से विख्यात हुए।
बचपन से ही लच्छण महाराज तपस्वी प्रवृत्ति के थे। ग्रामीणों के अनुसार उनमें अद्भुत सिद्धियां थीं—अदृश्य होना, रूप बदलना, कहीं भी प्रकट हो जाना और एक ही समय में दो स्थानों पर दिखाई देना उनकी विशेषता मानी जाती है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी शासन ने उन्हें बंदी बनाकर रायपुर कोतवाली में रखा, लेकिन अगले ही दिन वे जेल से अदृश्य हो गए। खोजबीन में अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हें बूढ़ातालाब के मध्य कमल के पत्ते पर ध्यानस्थ पाया। गोली चलाने पर भी बाबा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वे जल पर पैदल चलते हुए बाहर आए—यह घटना आज भी बाबा के महान चमत्कारों में गिनी जाती है। एक अन्य प्रसंग में बताया जाता है कि बाबा ने अपना स्थूल शरीर गांव में छोड़कर लखनपुरी चारामा दैविक आह्वान हेतु प्रस्थान किया था। अंग्रेज सिपाहियों के दबाव में ग्रामीणों ने बाबा के शरीर को भूमि में दफना दिया। लौटने पर बाबा ने कहा कि वे यहीं वास करेंगे और गांव को हर संकट से बचाएंगे। उनके निर्देश पर समाधि स्थल के समीप भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। बाबा ने अपने भक्तों को आश्वस्त किया कि जो भी श्रद्धा से समाधि पर मन्नत मांगेगा, उसे अवश्य आशीर्वाद मिलेगा।
सन् 1883 में भीषण अकाल के समय जब वर्षा नहीं हुई, तब ग्रामीणों ने मंदिर में 24 घंटे का अखंड रामायण पाठ किया। बाबा के आशीर्वाद से गांव की सरहद में मूसलाधार वर्षा हुई और फसलें बच गईं। इसके बाद से बाबा के प्रति श्रद्धा और अधिक गहरी होती चली गई।
सन् 1980 से बाबा की समाधि स्थल पर मकर संक्रांति के दिन भव्य मेला आयोजित किया जाने लगा, जिसकी शुरुआत में श्री भगवान सिंह कतलम, स्व. इंदरमन मानिकपुरी, स्व. लखन लाल साहू, स्व. शैलेंद्र साहू, स्व. कुंती बाई साहू एवं श्री लेखराम साहू का विशेष योगदान रहा। आज स्थिति यह है कि गांव में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य—चाहे विवाह हो, गृह प्रवेश हो या कोई सामाजिक-धार्मिक आयोजन—बाबा के आशीर्वाद के बिना अधूरा माना जाता है। आसपास के ग्रामीण भी अपनी मनोकामनाओं के लिए यहां पहुंचते हैं। बाबा के आशीर्वाद का एक और उदाहरण छत्तीसगढ़ राज्य गठन से पूर्व का बताया जाता है, जब रूपझर थाना क्षेत्र में नक्सली हमले में 17 जवान शहीद हो गए थे। उस घटना में बाबा के वंशज, सब-इंस्पेक्टर श्री प्रशांत सिंह कतलम का सुरक्षित बच जाना भक्तजन बाबा की कृपा मानते हैं। मंदिर वाले बाबा की यह गाथा केवल आस्था की नहीं, बल्कि विश्वास, संस्कृति और सामूहिक चेतना की भी प्रतीक है। मकर संक्रांति के पावन पर्व एवं नववर्ष के अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा बाबा के चरणों में शीश नवाकर सुख-समृद्धि की कामना की जा रही है।