YC न्यूज़ डेस्क। बस्तर के 618 साल पुराने ऐतिहासिक दशहरे की प्रमुख रस्म ‘मावली परघाव’ मंगलवार देर शाम पारंपरिक श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई गई। मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली के स्वागत के लिए जगदलपुर में हजारों श्रद्धालु जुटे। सड़कों पर फूलों की चादर बिछाई गई, घरों की छतों से पुष्पवर्षा हुई और आतिशबाजी के बीच माता का भव्य स्वागत किया गया। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए डेनमार्क से आए विदेशी पर्यटक भी पहुंचे। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने पारंपरिक कांटाबंद पहनकर माता की आराधना की और सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। मां दंतेश्वरी के छत्र और मां मावली की डोली के आगमन से पूरा शहर भक्तिमय माहौल में नजर आया।
कांटाबंद पहनकर राजपरिवार ने निभाई परंपरा
मावली परघाव की रस्म में बस्तर राजपरिवार की विशेष भूमिका रहती है। कमलचंद्र भंजदेव ने कांटाबंद पहनकर माता के छत्र और डोली को प्रणाम किया। कांटाबंद फूलों से बना पारंपरिक ताज है, जिसे बस्तर के राजा माता के स्वागत के दौरान धारण करते थे। कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार, कांटाबंद में इस्तेमाल होने वाला विशेष फूल बस्तर के जंगलों में मिलता है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को निभाना उनके लिए आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा विषय है। पूजा-अर्चना के बाद माता की डोली को कंधे पर उठाकर राजमहल लाया गया। मां दंतेश्वरी और मां मावली को बस्तर राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता है। बस्तर दशहरे में शामिल होने के बाद दोनों देवियां विदाई तक राजमहल परिसर में विराजमान रहेंगी।
सड़कों पर फूलों की चादर, छतों से हुई पुष्पवर्षा
माता के स्वागत के लिए जगदलपुर में जगह-जगह फूल बिछाए गए थे। श्रद्धालुओं ने डोली और छत्र के आगमन पर पुष्पवर्षा की। स्वागत के दौरान आतिशबाजी भी की गई। माता के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर पहुंचे, जबकि आसपास के मकानों की छतों पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई। दंतेवाड़ा जिले के कलेक्टर और एसपी भी माता की डोली व छत्र के साथ जगदलपुर पहुंचे। राजपरिवार के सदस्यों और प्रशासनिक अधिकारियों ने परंपरा के अनुसार स्वागत किया।
बस्तर की परंपरा देखने डेनमार्क से पहुंचे पर्यटक
मावली परघाव में शामिल होने के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु जगदलपुर पहुंचे। डेनमार्क से आए विदेशी पर्यटकों के एक समूह ने भी इस आयोजन को करीब से देखा। ओडिशा से आए श्रद्धालुओं ने बताया कि उन्होंने पहली बार माता के दर्शन किए। वहीं, डेनमार्क से आए पर्यटकों ने बस्तर की संस्कृति और परंपराओं को अनूठा बताया। उन्होंने यहां के लोगों के सरल और सहज व्यवहार की भी सराहना की। इस आयोजन के जरिए विदेशी मेहमानों को बस्तर की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं को करीब से जानने का अवसर मिला।
दंतेवाड़ा जाकर दिया गया था दशहरे का निमंत्रण
बस्तर दशहरे की परंपरा के अनुसार, शारदीय नवरात्र की पंचमी पर कमलचंद्र भंजदेव दंतेवाड़ा पहुंचे थे। वहां उन्होंने मां दंतेश्वरी को मंगल पत्र अर्पित कर बस्तर दशहरे में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। इसके बाद अष्टमी के दिन माता की डोली और छत्र को जगदलपुर के लिए रवाना किया गया। अष्टमी की देर रात इनके जगदलपुर पहुंचने के बाद मंगलवार को मावली परघाव की रस्म पूरी की गई।
नौ दिन की तपस्या के बाद जोगी उठाई की रस्म पूरी
बस्तर दशहरे के अंतर्गत जगदलपुर के सिरहासार भवन में जोगी उठाई की रस्म भी पूरी की गई। इस परंपरा में जोगी नौ दिनों तक उपवास रखकर कुंड में बैठते हैं और माता की आराधना करते हैं। मान्यता के अनुसार, जोगी की तपस्या दशहरे के आयोजन को निर्विघ्न संपन्न कराने की कामना से जुड़ी है। नौ दिनों की साधना पूरी होने के बाद जोगी को कुंड से उठाया गया।
अब विजय रथ की परिक्रमा और भीतर रैनी की बारी
मावली परघाव के बाद बस्तर दशहरे में अगले चरण के रूप में आठ चक्कों वाले विजय रथ की परिक्रमा होगी। इसमें किलेपाल के ग्रामीण रथ खींचेंगे। इसके बाद भीतर रैनी की रस्म निभाई जाएगी, जिसमें ग्रामीण प्रतीकात्मक रूप से विजय रथ को अपने कब्जे में ले लेते हैं। बस्तर दशहरे की इन रस्मों में स्थानीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यही वजह है कि यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक विरासत, जनभागीदारी और विशिष्ट लोक परंपराओं का भी प्रतीक माना जाता है।