दुर्ग | दुर्ग जिले में पहली बार गांधी शिल्प बाजार–हस्तशिल्प प्रदर्शनी एवं बिक्री मेला का आयोजन किया गया है। इस आयोजन का उद्देश्य स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और ग्रामीण कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। यह मेला आत्मनिर्भर भारत की भावना को साकार करते हुए कारीगरों और उपभोक्ताओं के बीच एक जीवंत सेतु का कार्य कर रहा है। यह प्रदर्शनी गोंडवाना भवन, सिविल लाइन दुर्ग में 12 से 18 अक्टूबर तक आयोजित की जा रही है। रोजाना सुबह 11 बजे से रात 10 बजे तक खुलने वाले इस मेले में देश के 8 राज्यों से आए लगभग 45 स्टॉलों पर पारंपरिक हस्तशिल्प और खादी उत्पादों की झलक देखने को मिल रही है।
बांस, जूट और गोदना कला ने खींचा ध्यान
मेले में बांस कला, जूट क्राफ्ट, गोदना प्रिंट, मृद्भांड, खादी वस्त्र, हैंडलूम और हर्बल उत्पादों जैसे विविध शिल्प उत्पाद प्रदर्शित किए गए हैं। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के असिस्टेंट डायरेक्टर मनोज राठी ने बताया कि यह आयोजन केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से किया गया है ताकि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के कारीगरों को एक समान मंच मिल सके। उन्होंने कहा, “इस पहल का लक्ष्य है कि कारीगर सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ सकें और अपने उत्पादों को उचित मूल्य पर बेच सकें। इससे उन्हें आर्थिक स्थिरता और पहचान दोनों मिलेगी।”
गोदना कला बनी आकर्षण का केंद्र
अंबिकापुर जिले के लखनपुर क्षेत्र की शिल्पकार दिलबसिया पावले की पारंपरिक गोदना प्रिंट कला ने प्रदर्शनी में सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया।
दिलबसिया पावले ने बताया कि वे 40 वर्ष की उम्र से यह कला कर रही हैं और पूरी तरह हर्बल रंगों से कपड़ों, साड़ियों, चादरों और रुमालों पर डिज़ाइन बनाती हैं। उन्होंने कहा, “मैं अशिक्षित हूं, पर माता-पिता से सीखी यह कला अब मेरे परिवार के लिए रोज़गार का साधन बन गई है। ऐसे आयोजन हमें आत्मनिर्भर बनने और हमारे उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का मौका देते हैं।”
कारीगरों के लिए बड़ा मंच, आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
राज्य खाद्य एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष राकेश पांडे ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त पहल से पारंपरिक कारीगरों को नई ऊर्जा मिल रही है।
उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य है कि हर शिल्पकार को उसके उत्पादों के लिए स्थायी बाजार मिले। दुर्ग में यह मेला उसी दिशा में एक सार्थक प्रयास है।” पांडे ने बताया कि दुर्ग में 45 स्टॉलों के बाद जल्द ही भिलाई में 70 स्टॉलों की प्रदर्शनी लगाने की योजना है। इसके अलावा राज्य स्तरीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी आयोजित करने की तैयारी भी की जा रही है, जिसके लिए केंद्र सरकार से सहयोग अपेक्षित है।
स्वदेशी भावना के साथ उत्साह का माहौल
गांधी शिल्प बाजार में आए आगंतुक पारंपरिक कलाओं, हस्तनिर्मित वस्त्रों और स्वदेशी उत्पादों को खूब सराह रहे हैं। आयोजन स्थल पर लोकसंगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनें वातावरण को और जीवंत बना रही हैं। यह आयोजन न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त करने का माध्यम है, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के संदेश को भी मजबूत कर रहा है।