“सुरंग के उस पार” : डॉ. परदेशीराम वर्मा की आत्मकथा का विमोचन, संघर्ष और जिजीविषा की बनी मिसाल

रायपुर। अगासदिया संस्था द्वारा रायपुर में आयोजित एक गरिमामय साहित्यिक संध्या में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. परदेशीराम वर्मा की आत्मकथा “सुरंग के उस पार” का विमोचन हुआ। यह कार्यक्रम 7 सितम्बर की शाम छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के निवास सभागृह में आयोजित किया गया। पुस्तक का विमोचन डॉ. रमन सिंह, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत और राजमाता फुलवा देवी ने संयुक्त रूप से किया।

इस अवसर पर डॉ. रमन सिंह ने कहा—
“डॉ. वर्मा का जीवन संघर्ष, साहस और कठिनाइयों की सुरंग से बाहर आने की अद्भुत यात्रा है। वे मेरे प्रिय लेखक हैं और उनकी किताबों को मैं चाव से पढ़ता हूं। उनकी लेखनी प्रेरणास्पद है और वे आने वाले बीस वर्षों तक साहित्य जगत को और समृद्ध करेंगे।”

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने उन्हें “माटीराम” कहकर संबोधित करते हुए कहा कि—
“माटी के प्रति इनका प्रेम और लेखन की सजगता इन्हें अद्वितीय बनाती है। इनके उपन्यासों और शोधपरक लेखन ने छत्तीसगढ़ी साहित्य को नई पहचान दी है।”

विशेष अतिथि राजमाता फुलवा देवी ने डॉ. वर्मा के लेखन को मांझी आंदोलन से जोड़ते हुए कहा कि उनकी रचनाओं ने समाज को नई दिशा दी है।

विमोचन के दौरान डॉ. वर्मा ने भावुक होकर कहा—
“यह किताब उन सभी का आभार है, जिनके सहारे मैं कठिन जीवन की लंबी सुरंग से बाहर आ सका। संत पवन दीवान, ठाकुर विघ्नहरण सिंह, देवदास बंजारे, डॉ. खूबचंद बघेल जैसे मार्गदर्शक मेरे प्रेरणास्रोत रहे।”

साहित्यकार डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि “सुरंग के उस पार” संघर्ष और जिजीविषा का अद्भुत दस्तावेज है, जबकि डॉ. सोनाली चक्रवर्ती ने इसे छत्तीसगढ़ के “प्रेमचंद” के लेखन से तुलना करते हुए प्रेरणादायी बताया।

कार्यक्रम में राजेन्द्र साहू ने छत्तीसगढ़ महतारी वंदना प्रस्तुत की। स्मिता वर्मा ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि बाबूजी सुख-दुख में समभाव से जीते हैं और उनकी आत्मकथा में यही दर्शन परिलक्षित होता है।महेश वर्मा ने संचालन किया और विविध प्रसंगों से कार्यक्रम को रोचक बनाया। सभागार में साहित्य, समाज सेवा, चिकित्सा, कला, प्रशासन और राजनीति क्षेत्र के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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