खुलासे के बाद भी सन्नाटा… जांच क्यों नहीं ? पाटन मनरेगा -प्लांटेशन मामले में उद्यानिकी विभाग और जिला पंचायत दुर्ग कटघरे में ! बघेल @ बघेल के बयानों से सियासत गरम…लेकिन कार्रवाई शून्य

मनीष चंद्राकर / जामगांव आर। पाटन ब्लॉक में प्लांटेशन घोटाले के खुलासे के बाद जहां एक ओर पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है, वहीं दूसरी ओर उद्यानिकी विभाग और जिला पंचायत दुर्ग की चुप्पी अब बड़े सवाल खड़े कर रही है। मीडिया में मामला प्रमुखता से सामने आने के बावजूद अब तक न तो किसी प्रकार की आधिकारिक जांच शुरू हुई है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई की गई है। दरअसल पाटन प्लांटेशन मामला अब सिर्फ सूखे पौधों का नहीं रहा…यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। अब नजर इस बात पर है कि—जिला प्रशासन कब जागेगा? और क्या सच सामने आएगा… या फाइलों में ही दफन हो जाएगा ?

🚨 राजनीतिक बयान आए, लेकिन सिस्टम अब भी ‘मौन’
इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्पष्ट कहा है कि—
“जब मामला मीडिया और अखबारों की सुर्खियों में है, तब ऐसी गंभीर अनियमितताओं की तत्काल जांच और सख्त कार्रवाई होना चाहिए। वहीं दुर्ग सांसद विजय बघेल ने भी मामले को गंभीर बताते हुए कहा—मनरेगा और वृक्षारोपण जैसे विषय सीधे जनजीवन से जुड़े हैं, इनमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी स्वीकार्य नहीं है। अधिकारियों को तुरंत जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन सवाल वही—जब जिले के शीर्ष नेता से निर्देश और बयान आ चुके हैं, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं?

जिम्मेदार विभागों पर उठे सीधे सवाल..
पूरा मामला सीधे तौर पर उद्यानिकी विभाग और जिला पंचायत दुर्ग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है।
क्या विभागीय अधिकारियों ने बिना ग्राउंड वेरिफिकेशन के ही भुगतान स्वीकृत किया? क्या उद्यानिकी विभाग ने मॉनिटरिंग में लापरवाही बरती? या फिर जानबूझकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो रही है

🔍 ‘किसे बचाया जा रहा है?’—सबसे बड़ा सवाल
मामले के सार्वजनिक होने के बाद भी जांच शुरू न होना अब संदेह को और गहरा कर रहा है। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि— “इतने बड़े स्तर पर गड़बड़ी बिना विभागीय मिलीभगत के संभव नहीं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है—क्या किसी बड़े अधिकारी या सप्लायर को बचाने की कोशिश हो रही है?

⚖️ जनता में बढ़ता आक्रोश, भरोसे पर असर
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर इस तरह की योजनाएं सिर्फ कागजों में ही चलती रहीं, तो सरकार की जनहितकारी योजनाओं से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। अब मांग साफ है—
✔️ उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच
✔️ दोषियों पर कड़ी कार्रवाई
✔️ और सरकारी धन की रिकवरी



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