YC न्यूज़ डेस्क नई दिल्ली / चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बढ़ते मामलों को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि नवजात बच्चों की चोरी के मामलों पर राज्य सरकारों को तुरंत और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। विशेष रूप से, यदि किसी अस्पताल से नवजात बच्चा चोरी होता है, तो सबसे पहले उस अस्पताल का लाइसेंस रद्द कर देना चाहिए।
यह फैसला उस मामले से जुड़ा है जिसमें वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में हुई बच्चा चोरी की घटनाओं में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपियों को जमानत दे दी थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए बच्चों के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसका दायरा बढ़ाया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा भारतीय इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट से रिपोर्ट मांगी थी।
जस्टिस जे.बी. पारडीवाला की अध्यक्षता वाली बेंच ने आरोपियों की जमानत रद्द करते हुए कहा कि यह एक देशव्यापी गिरोह है, जिसके चुराए गए बच्चे पश्चिम बंगाल, झारखंड और राजस्थान तक से बरामद किए गए हैं। कोर्ट ने आरोपियों को समाज के लिए खतरा बताया और हाई कोर्ट के जमानत देने के फैसले को लापरवाही का प्रतीक कहा। साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार की निष्क्रियता की भी आलोचना की गई।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी हाई कोर्ट चाइल्ड ट्रैफिकिंग से जुड़े लंबित मामलों का ब्यौरा तैयार करें और ट्रायल कोर्ट को छह महीने में निपटारा करने का आदेश दें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “मरने वाले बच्चे को मां-बाप ईश्वर के पास गया मान लेते हैं, लेकिन चोरी हुआ बच्चा उन्हें आजीवन अनजाने डर में रखता है।”