बिलासपुर | छत्तीसगढ़ में ग्रेडेशन (10 साल की सेवा के बाद क्रमोन्नति वेतन लाभ) की मांग कर रहे शिक्षकों को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस विषय पर दाखिल 1,188 शिक्षकों की याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिसके बाद प्रदेश के ढाई लाख से अधिक शिक्षक इस निर्णय से सीधे प्रभावित होंगे। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविलियन से पहले शिक्षाकर्मी स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन नहीं थे, इसलिए वे ग्रेडेशन लाभ के पात्र नहीं माने जा सकते।
जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच ने आदेश सुनाते हुए कहा कि संविलियन नीति के अनुसार किसी भी पूर्व लाभ का दावा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सेवा अवधि की गणना 1 जुलाई 2018 — संविलियन की प्रभावी तारीख — से ही मान्य होगी, और इससे पहले की सेवा को ग्रेडेशन के लिए नहीं जोड़ा जा सकता।
• क्या था पूरा मामला
पंचायत विभाग में ग्रेड-3, ग्रेड-2 और ग्रेड-1 के पद पर नियुक्त शिक्षाकर्मी पंचायत राज अधिनियम, 1993 के तहत जनपद पंचायतों के नियंत्रण में कार्यरत थे। 30 जून 2018 को जारी संविलियन नीति के तहत इनका स्कूल शिक्षा विभाग में विलय किया गया और पदनाम क्रमशः सहायक शिक्षक (एलबी), शिक्षक (एलबी) और व्याख्याता (एलबी) कर दिए गए, लेकिन ग्रेडेशन का लाभ नहीं दिया गया। इसी के विरोध में 1,188 शिक्षकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिकाकर्ता शिक्षकों का तर्क था कि 10 साल की सेवा पूरी करने के बाद ग्रेडेशन दिए जाने संबंधी 10 मार्च 2017 के आदेश को विभाग ने लागू नहीं किया, जबकि उन्होंने सोना साहू केस में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले का हवाला देते हुए समान लाभ की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि सोना साहू केस के हालात इस मामले से पूरी तरह अलग हैं, इसलिए उसे आधार नहीं माना जा सकता।
• सरकार के तर्क को सही माना
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि—याचिकाकर्ता शिक्षक नियमित शासकीय कर्मचारी नहीं, बल्कि पंचायत कर्मचारी थे,उनकी सेवा व नियंत्रण जनपद पंचायत के अधीन था ! संविलियन से पहले वे स्कूल शिक्षा विभाग के सेवक नहीं थेइसलिए वे ग्रेडेशन की अनिवार्य पात्रता शर्तें पूरी नहीं करते,कोर्ट ने सरकार के इन तर्कों को सही मानते हुए कहा कि संविलियन से पहले के वेतनमान, वेतन वृद्धि या ग्रेडेशन का दावा मान्य नहीं होगा, क्योंकि संविलियन की नीति स्वयं इस पर रोक लगाती है।
•;फैसला आने पर सरकार पर पड़ता भारी आर्थिक दबाव
कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि यदि फैसला शिक्षकों के पक्ष में आता तो सरकार को प्रति शिक्षक ₹3.5 लाख से ₹15 लाख तक का भुगतान करना पड़ता। विशेष रूप से ग्रेड-3 (सहायक शिक्षक पंचायत) से ग्रेड-2 (शिक्षक LB) में आने पर वेतनमान में भारी अंतर होता, जिससे 2015 से अब तक की एरियर राशि हजारों करोड़ तक पहुंच सकती थी और हर शिक्षक की मासिक सैलरी हजारों रुपए बढ़ जाती।
•पहले भी मिला है समय–समय पर वेतन लाभ,
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि शिक्षाकर्मियों को—7 वर्ष की सेवा के बाद समयमान वेतनमान,वर्ष 2014 में समकक्ष वेतनमान जैसे लाभ दिए गए हैं, लेकिन ग्रेडेशन यानी वेतन क्रमोन्नति की पात्रता संविलियन नीति में नहीं है, इसलिए उन्हें अतिरिक्त प्रमोशन आधारित वेतन लाभ नहीं दिया जा सकता।
* शिक्षक संगठनों में असंतोष, आगे की रणनीति पर चर्चा
फैसले के बाद शिक्षक संगठनों में नाराज़गी देखी जा रही है। संघों का कहना है कि जब हम 10 साल से अधिक समय तक स्कूलों में सेवा दे चुके हैं तो हमारी सेवा अवधि क्यों नहीं जोड़ी गई। हालांकि, फिलहाल कोर्ट का आदेश लागू होते ही यह विषय कानूनी रूप से समाप्त माना जा रहा है, लेकिन संगठन आगे की पुनर्विचार (Review) या अन्य कानूनी विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं।