
(बुजुर्गों की स्मृतियों में आज भी जीवित हैं लोकविश्वास, नई पीढ़ी के लिए प्रकृति और परंपरा को जानने का अवसर)
जामगाँव आर । शारदीय नवरात्रि में जब चारों ओर मां दुर्गा की आराधना, शक्ति उपासना और देवी भक्ति की गूंज सुनाई दे रही है, ऐसे में दक्षिण पाटन क्षेत्र के ग्राम बेल्हारी की धरती पर खिले हिंगलाज के सुनहरे पीले फूल प्रकृति के साथ लोकआस्था का भी अनूठा दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। गांव के उत्तर-पूर्वी हिस्से से लेकर गौठान के किनारे, बाजार स्थल, मुक्तिधाम और बेल्हारी-जामगांव-आर मुख्य मार्ग के आसपास बड़ी संख्या में खिले इन फूलों को देखकर ऐसा लगता है, मानो प्रकृति ने गांव की धरती पर पीले रंग की चादर बिछा दी हो। नवरात्रि के पावन दिनों में यह दृश्य केवल आंखों को सुकून देने वाला प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन में पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपराओं, देवी श्रद्धा और प्रकृति के साथ मनुष्य के भावनात्मक रिश्ते की याद भी दिलाता है।.सामान्यतः खेतों की मेड़ों, खाली जमीनों और नमी वाले स्थानों पर स्वतः उगने वाली हिंगलाज वनस्पति इन दिनों अपने पीले फूलों के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है। गांव की पगडंडियों और सड़कों के किनारे दूर तक फैली इसकी सुनहरी छटा राहगीरों को ठहरकर देखने के लिए विवश कर देती है।
• हिंगलाज के फूलों में देवी आस्था का भाव, लोकमान्यताओं में विशेष स्थान-
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में हिंगलाज को लेकर अलग-अलग पारंपरिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे पीतांबर नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय लोकविश्वासों में इस वनस्पति को देवी शक्ति, आस्था और मंगलभाव से जोड़कर देखा जाता है। ग्राम बेल्हारी के बुजुर्ग श्यामलाल महतो बताते हैं कि कवाँर माह से इसमें फूल आते है जो सामान्यतः कार्तिक मास तक रहते है, वे बताते है कि पुराने समय में गांव के लोगों के बीच हिंगलाज के पौधे को लेकर विशेष श्रद्धा थी। लोकमान्यता थी कि लंबे समय से शारीरिक या मानसिक कष्ट झेल रहे व्यक्ति के लिए इस पौधे की सेवा करते हुए प्रार्थना करना और देवी का स्मरण करना संकट से मुक्ति की कामना का एक माध्यम होता था। श्यामलाल महतो के अनुसार, बदलते समय के साथ नई पीढ़ी में ऐसी वनस्पतियों और उनसे जुड़ी लोककथाओं की जानकारी कम होती जा रही है। बेल्हारी में हिंगलाज के फूलों की सुनहरी छटा इसी दिशा में एक अवसर प्रस्तुत करती है। जरूरत है कि इन पौधों को अनावश्यक रूप से नष्ट करने के बजाय इनके प्राकृतिक स्वरूप को समझा जाए, इनके बारे में वैज्ञानिक जानकारी जुटाई जाए और लोकपरंपराओं को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
• बलूचिस्तान के हिंगलाज माता शक्तिपीठ से जुड़ती है श्रद्धा की कड़ी-
गायत्री परिवार से जुड़े अशोक सिंह बताते हैं कि हिंगलाज नाम को लेकर धार्मिक आस्था की एक व्यापक परंपरा भी प्रचलित है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज माता मंदिर को हिंदू धर्म के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। इस शक्तिपीठ से माता सती की कथा जुड़ी हुई है। इसी कारण हिंगलाज नाम ग्रामीण लोकचेतना में भी श्रद्धा और आध्यात्मिक भाव के साथ स्मरण किया जाता है। बताया कि इस अमूल्य वनस्पति को विशिष्ट तांत्रिक साधनाओं, तंत्र-मंत्र और गुप्त पूजा-पाठ में भी उपयोग किया जाता है।
• प्रकृति की इस धरोहर को सहेजना भी जरूरी –
भिलाई के ट्री मेन के नाम से पहचाने जाने वाले बालूराम वर्मा के अनुसार, प्रकृति की गोद में स्वतः पनपने वाली वनस्पतियां ग्रामीण परिवेश की विशिष्ट पहचान होती हैं। इनके संरक्षण के लिए जरूरी है कि स्थानीय वनस्पतियों की पहचान, उनके प्राकृतिक आवास और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए। ग्राम आगेसरा के सरजू राम साहू ने बताया कि ग्रामीण अंचलों में अनेक ऐसी वनस्पतियां मिलती हैं, जिनका महत्व केवल उनके उपयोग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके साथ लोककथाएं, पारिवारिक स्मृतियां और धार्मिक विश्वास भी जुड़े रहते हैं। हिंगलाज को लेकर प्रचलित मान्यताएं भी इसी लोकपरंपरा का हिस्सा हैं।