
रायपुर। सोशल मीडिया के दौर में बच्चों के जन्मदिन, स्कूल फंक्शन, छुट्टियों, उपलब्धियों और रोजमर्रा के खास पलों की तस्वीरें साझा करना माता-पिता के लिए आम बात हो गई है। लेकिन एक सामान्य-सी पोस्ट बच्चे की निजी जानकारी और सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। एक बार इंटरनेट पर फोटो या वीडियो अपलोड होने के बाद उस पर पूरी तरह नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है। तस्वीर डाउनलोड होकर दोबारा शेयर की जा सकती है और AI तथा डीपफेक तकनीक के जरिए उसका गलत इस्तेमाल भी संभव है। फोटो के बैकग्राउंड में दिख रही स्कूल यूनिफॉर्म, स्कूल का नाम, घर का पता या लोकेशन जैसी छोटी जानकारी भी अनजान लोगों तक बच्चे से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचा सकती है। इसी को देखते हुए बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर पुलिस और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह देते हैं। सोशल मीडिया पर बच्चों की तस्वीरें साझा करने की आदत को ‘शेयरेंटिंग’ (Sharenting) कहा जाता है।
क्या है ‘शेयरेंटिंग’?
‘शेयरेंटिंग’ शब्द ‘शेयरिंग’ और ‘पेरेंटिंग’ से मिलकर बना है। इसमें माता-पिता अपने बच्चों की तस्वीरें, वीडियो, उपलब्धियां और रोजमर्रा की गतिविधियां सोशल मीडिया पर साझा करते हैं। यह आदत काफी सामान्य हो चुकी है, लेकिन साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने से पहले उसके संभावित परिणामों पर विचार करना जरूरी है। McAfee के 2018 के ‘द एज ऑफ कंसेंट’ सर्वे में भी भारत में बच्चों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करने की व्यापकता सामने आई थी। सर्वे के अनुसार बड़ी संख्या में अभिभावक ऐसी तस्वीरें भी शेयर करते हैं, जो बच्चे के बड़े होने पर उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती हैं।
बच्चों की फोटो शेयर करना कितना सुरक्षित?
बच्चों की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करना अपने आप में हमेशा असुरक्षित नहीं है, लेकिन इसे पूरी तरह जोखिम-मुक्त भी नहीं माना जा सकता। तस्वीर के साथ बच्चे का नाम, स्कूल, घर, लोकेशन, परिवार और रोजाना की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी अनजाने में सार्वजनिक हो सकती है। सार्वजनिक अकाउंट पर ऐसी जानकारी अनजान लोगों तक भी पहुंच सकती है। इसलिए फोटो शेयर करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसमें बच्चे की पहचान या उसके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी कोई संवेदनशील जानकारी तो नहीं दिख रही।
बच्चों की फोटो से जुड़े प्रमुख साइबर रिस्क
बच्चों की तस्वीरों और वीडियो का गलत इस्तेमाल कई तरीकों से किया जा सकता है।
- पहचान की चोरी: फोटो के साथ नाम, स्कूल या दूसरी जानकारी मिलने पर बच्चे की पहचान से जुड़ी जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है।
- लोकेशन लीक: फोटो या पोस्ट से बच्चे के घर, स्कूल या किसी नियमित स्थान का पता लगाया जा सकता है।
- AI मॉर्फिंग और डीपफेक: सामान्य तस्वीर को एडिट कर उसका गलत या आपत्तिजनक इस्तेमाल किया जा सकता है।
- साइबर बुलिंग: बच्चे की तस्वीर का मजाक उड़ाने या उसे ऑनलाइन परेशान करने के लिए इस्तेमाल हो सकता है।
- फर्जी अकाउंट: बच्चे की फोटो का इस्तेमाल कर नकली सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाई जा सकती है।
- ऑनलाइन ग्रूमिंग: अनजान व्यक्ति बच्चे की ऑनलाइन गतिविधियों पर लगातार नजर रखकर संपर्क बनाने की कोशिश कर सकता है।
- डिजिटल फुटप्रिंट: पोस्ट डिलीट करने के बाद भी उसकी कॉपी किसी दूसरे व्यक्ति के पास रह सकती है।
स्कूलों की सोशल मीडिया पोस्ट भी बन सकती है जोखिम
स्कूलों के सोशल मीडिया पेज अक्सर सार्वजनिक होते हैं। ऐसे में बच्चों की तस्वीरों के साथ स्कूल का नाम, यूनिफॉर्म, कार्यक्रम का समय और स्थान जैसी जानकारी भी सामने आ सकती है। इससे किसी अनजान व्यक्ति को बच्चे की गतिविधियों और दिनचर्या के बारे में अनावश्यक जानकारी मिल सकती है। इसलिए स्कूलों को बच्चों की तस्वीरें पोस्ट करने से पहले अभिभावकों की सहमति और स्पष्ट सोशल मीडिया नीति पर ध्यान देना चाहिए।
रिपोर्ट कार्ड और एडमिट कार्ड कभी पोस्ट न करें
बच्चों से जुड़े दस्तावेज सोशल मीडिया पर शेयर करना विशेष रूप से जोखिम भरा हो सकता है। रिपोर्ट कार्ड, एडमिट कार्ड, सर्टिफिकेट या पहचान संबंधी दस्तावेजों में बच्चे का पूरा नाम, जन्मतिथि, रोल नंबर, माता-पिता का नाम और अन्य संवेदनशील जानकारी हो सकती है। इन जानकारियों का इस्तेमाल साइबर ठगी या पहचान संबंधी धोखाधड़ी में किया जा सकता है।
जियोटैग से पता चल सकती है लोकेशन
जियोटैग फोटो या वीडियो के साथ जुड़ी लोकेशन की जानकारी होती है। यदि किसी तस्वीर में लोकेशन डेटा मौजूद है, तो उससे यह पता लगाया जा सकता है कि फोटो कहां ली गई थी। इसलिए सोशल मीडिया पर बच्चों की तस्वीर शेयर करने से पहले लोकेशन और जियोटैग सेटिंग जरूर चेक करें। लाइव लोकेशन के साथ बच्चों की फोटो पोस्ट करने से बचना बेहतर है।
AI के दौर में बढ़ा खतरा
AI टूल्स ने तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ को पहले की तुलना में आसान बना दिया है। किसी सामान्य फोटो को भी एडिट करके भ्रामक या आपत्तिजनक कंटेंट तैयार किया जा सकता है।
यही वजह है कि साइबर विशेषज्ञ बच्चों की तस्वीरों को सार्वजनिक करने में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
अनजान व्यक्ति की इन गतिविधियों पर रहें सतर्क
अगर कोई अनजान व्यक्ति बच्चे की तस्वीरों या गतिविधियों में असामान्य रुचि दिखा रहा है, तो अभिभावकों को सतर्क हो जाना चाहिए।
- बच्चे की हर पोस्ट या गतिविधि को लगातार ट्रैक करना।
- बच्चे की तस्वीरों पर बार-बार कमेंट करना।
- निजी मैसेज के जरिए बच्चे की जानकारी मांगना।
- बार-बार बच्चे की फोटो या वीडियो मांगना।
- बच्चे से सीधे चैट या कॉल करने की कोशिश करना।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति को ब्लॉक करने के साथ जरूरत पड़ने पर प्लेटफॉर्म और पुलिस को रिपोर्ट करें।
बच्चों की कौन-सी तस्वीरें ऑनलाइन नहीं डालनी चाहिए?
अभिभावकों को विशेष रूप से इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने से बचना चाहिए:
- रिपोर्ट कार्ड, एडमिट कार्ड या सर्टिफिकेट।
- आधार, पासपोर्ट या अन्य पहचान दस्तावेज।
- घर का पता या स्पष्ट लोकेशन दिखाने वाली तस्वीरें।
- मेडिकल ट्रीटमेंट से जुड़ी तस्वीरें।
- बच्चे के रोने, सजा पाने या शर्मिंदा होने वाले पल।
- लाइव लोकेशन वाली तस्वीरें।
- बच्चे की रोजाना की पूरी दिनचर्या बताने वाली पोस्ट।
- स्कूल की पहचान और बच्चे की नियमित टाइमिंग एक साथ दिखाने वाली तस्वीरें।
बच्चों की फोटो पोस्ट करने से पहले पूछें ये 5 सवाल
किसी भी फोटो को पोस्ट करने से पहले अभिभावक खुद से पांच सवाल पूछ सकते हैं:
- क्या इस तस्वीर से बच्चे की पहचान आसानी से हो सकती है?
- क्या इससे बच्चे की लोकेशन या स्कूल का पता चल सकता है?
- क्या बच्चा बड़ा होने पर इस पोस्ट से असहज हो सकता है?
- क्या मैं यही तस्वीर किसी अनजान व्यक्ति को दिखाने में सहज रहूंगा?
- क्या इस तस्वीर को पोस्ट करना वास्तव में जरूरी है?
अगर इनमें से किसी सवाल का जवाब चिंता पैदा करता है, तो तस्वीर पोस्ट न करना ही बेहतर है।
पेरेंट्स के लिए 10 सेफ्टी टिप्स
- सोशल मीडिया अकाउंट को प्राइवेट रखें।
- फ्रेंड/फॉलोअर लिस्ट में केवल भरोसेमंद लोगों को रखें।
- बच्चे का पूरा नाम, स्कूल और पता सार्वजनिक न करें।
- लाइव लोकेशन या जियोटैग के साथ पोस्ट न करें।
- रिपोर्ट कार्ड, एडमिट कार्ड और पहचान दस्तावेज शेयर न करें।
- बच्चे की रोजाना की पूरी दिनचर्या ऑनलाइन न बताएं।
- संवेदनशील या शर्मिंदगी पैदा करने वाली तस्वीरें पोस्ट न करें।
- अजनबियों के कमेंट और मैसेज पर नजर रखें।
- बच्चे को भी ऑनलाइन प्राइवेसी और सुरक्षित-असुरक्षित व्यवहार के बारे में समझाएं।
- पोस्ट करने से पहले सोचें कि यह तस्वीर भविष्य में भी सार्वजनिक रहने पर ठीक लगेगी या नहीं।
डिजिटल प्राइवेसी बच्चों का भी अधिकार
बच्चों की डिजिटल प्राइवेसी को लेकर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 में विशेष प्रावधान किए गए हैं। कानून में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए अभिभावक या कानूनी संरक्षक की सहमति और बच्चों से जुड़े कुछ प्रकार के डेटा उपयोग पर विशेष सुरक्षा का प्रावधान है। इनसे जुड़े प्रावधानों के लागू होने की तारीख अलग-अलग सरकारी अधिसूचनाओं पर निर्भर करती है। इसलिए बच्चों की तस्वीरें और निजी जानकारी साझा करते समय अभिभावकों को केवल कानूनी प्रावधानों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी ओर से भी सावधानी बरतनी चाहिए।
गलत इस्तेमाल होने पर तुरंत क्या करें?
अगर बच्चे की तस्वीर का गलत इस्तेमाल होता है तो सबसे पहले उसके सबूत सुरक्षित रखें। संबंधित पोस्ट, प्रोफाइल या मैसेज के स्क्रीनशॉट लें और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को रिपोर्ट करें। साइबर अपराध की शिकायत के लिए 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर संपर्क किया जा सकता है। ऑनलाइन शिकायत के लिए भारत सरकार के National Cyber Crime Reporting Portal का इस्तेमाल किया जा सकता है।
साइबर सुरक्षा का गोल्डन रूल
साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर राहुल मिश्रा के मुताबिक, बच्चों से जुड़ी कोई भी चीज सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले “दो बार सोचें।”
सोशल मीडिया के कुछ लाइक्स और कमेंट्स के लिए बच्चे की निजता और सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहिए। बच्चों की डिजिटल पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी वास्तविक दुनिया की सुरक्षा। इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि जो जानकारी सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं है, उसे सार्वजनिक न करें।