
बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर में 600 से अधिक बंद स्कूल फिर हुए संचालित
रायपुर, 5 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अब शिक्षा की नई सुबह दिखाई देने लगी है। जिन इलाकों में कभी बंदूक और बारूद की आवाजें सुनाई देती थीं, वहां अब स्कूल की घंटी, बच्चों का राष्ट्रगान और किताबों की सरसराहट सुनाई दे रही है। नक्सलमुक्त होते क्षेत्रों में दो दशकों से बंद पड़े स्कूलों का दोबारा संचालन इस शिक्षक दिवस पर शांति, सुरक्षा और बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रहा है।
बंद पड़े स्कूल फिर से हुए गुलजार
छत्तीसगढ़ सरकार की सुरक्षा, पुनर्वास और जनकल्याणकारी नीतियों तथा ‘नियद नेल्ला नार’ जैसी योजनाओं के प्रभाव से दक्षिण बस्तर के सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बदलाव देखने को मिल रहा है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में लंबे समय से बंद पड़े 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को दोबारा संचालित किया गया है।
कई स्थानों पर नक्सली हिंसा में क्षतिग्रस्त स्कूल भवनों को फिर से संवारा गया है। कुछ भवनों का इस्तेमाल लंबे समय तक सुरक्षा बलों के कैंप के रूप में भी किया गया था। अब इन्हें बच्चों के अनुकूल वातावरण में विकसित कर शिक्षा का केंद्र बनाया जा रहा है।
शिक्षक बने शिक्षा की नई रोशनी के वाहक
इन क्षेत्रों में स्कूलों को फिर से जीवंत बनाने में स्थानीय शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों के बावजूद शिक्षक बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने में जुटे हैं। दूरस्थ वनांचलों में शिक्षक बच्चों से गोंडी, हल्बी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों में संवाद कर रहे हैं। इससे बच्चों और अभिभावकों का स्कूलों के प्रति विश्वास बढ़ रहा है। शिक्षक ग्रामीणों के बीच पहुंचकर अभिभावकों से संवाद कर रहे हैं और बच्चों को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।
बांस-तिरपाल के छप्परों में भी जारी है पढ़ाई
बीजापुर के पीड़िया, गंपूर और तमोड़ी जैसे क्षेत्रों सहित सुकमा के कई अंदरूनी इलाकों में वर्षों से बंद स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है। नक्सली हिंसा में स्कूल भवनों के क्षतिग्रस्त होने के बाद कई जगह ग्रामीणों ने प्रशासन के सहयोग से बांस और तिरपाल से अस्थायी कक्ष तैयार किए हैं, ताकि बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। स्थानीय भाषा की चुनौती को दूर करने और बच्चों में विश्वास पैदा करने के लिए स्थानीय शिक्षित युवाओं को ‘शिक्षा दूत’ के रूप में जोड़ा गया है। ये युवा दूरस्थ क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
स्मार्ट क्लास और टैबलेट से जुड़ रहा बस्तर का बचपन
दोबारा संचालित स्कूलों में अब पारंपरिक पढ़ाई के साथ आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। कई वनांचल स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट और टैबलेट के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने की पहल की जा रही है। विद्यालयों में मध्याह्न भोजन (न्योता भोजन) के साथ खेल सामग्री की उपलब्धता पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति बढ़ाने और उन्हें पढ़ाई के साथ खेल गतिविधियों से जोड़ने में मदद मिल रही है।
सुरक्षित माहौल से बढ़ा शिक्षकों का भरोसा
‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत सुरक्षा का दायरा बढ़ने से दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षकों के लिए स्कूलों तक पहुंचना पहले की तुलना में आसान और सुरक्षित हुआ है। शिक्षक अब नियमित रूप से विद्यालय पहुंचकर बच्चों को पढ़ाने में जुटे हैं।
स्कूल की घंटी बनी बदलाव और शांति की आवाज
इस शिक्षक दिवस पर नक्सलमुक्त क्षेत्रों में काम कर रहे शिक्षक वास्तव में ‘शिक्षा के दूत’ के रूप में सामने आए हैं। जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक की आवाजें विकास को रोकती थीं, वहां अब कलम और किताबें भविष्य की नई इबारत लिख रही हैं। नक्सलमुक्त इलाकों में गूंजती स्कूलों की घंटी केवल पढ़ाई शुरू होने का संकेत नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा, लोकतंत्र और विकास की वापसी का प्रतीक बन रही है। यह बदलाव इस विश्वास को मजबूत करता है कि शिक्षा ही समाज में स्थायी परिवर्तन और शांति की सबसे मजबूत नींव है।