(सीलिंग एक्ट के तहत वर्ष 1986 में मिली भूमि पूर्व मालिक को लौटा दी गई, तहसील से लेकर कलेक्टर तक न्याय की गुहार, फिर भी नहीं मिला समाधान )
जामगांव आर। पाटन ब्लॉक के ग्राम बटरेल निवासी 81 वर्षीय खोरबाहरा राम साहू की जिंदगी अब शासन की फाइलों में अटकी न्याय की प्रतीक्षा बनकर रह गई है। वर्ष 1986 में शासन द्वारा सीलिंग प्रकरण के तहत पाटन के ग्राम अरमरीखुर्द में 2 एकड़ कृषि भूमि उन्हें आजीविका हेतु आबंटित की गई थी। खोरबाहरा राम ने उस पर वर्ष 1991 तक खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण किया, मगर शासन ने अपर आयुक्त के निर्णय के अनुसार उक्त भूमि पूर्व भूमिस्वामी सुकदेव को वापस कर दी। इस निर्णय ने खोरबाहरा राम को फिर से भूमिहीन बना दिया। अब वे पिछले तीन दशक से रोजी मजदूरी करते हुए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। तहसील कार्यालय से लेकर कलेक्टर दरबार तक और नेताओं मंत्रियों के दफ्तरों में कई बार आवेदन देने के बावजूद ना उन्हें जमीन मिल रही और ना मुआवजा मिला।
वृद्ध ग्रामीण का कहना है — “शासन ने जब मुझे जीवनयापन के लिए भूमि दी थी तो उसे कैसे वापस ले सकता है? आज मैं फिर भूमिहीन हूँ।
गरीबी और उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी यह बुजुर्ग कभी ‘जनदर्शन’, कभी ‘सुशासन तिहार’ में गुहार लगाते हुए भटक रहा है। उनकी पीड़ा यह सवाल खड़ा करती है कि क्या शासन की संवेदनशीलता केवल घोषणाओं तक सीमित रह गई है? खोरबाहरा राम की तीन दशक लंबी लड़ाई शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल छोड़ जाती है।