
मनीष चंद्राकर /पाटन। कुछ व्यक्तित्व केवल पदों से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, विचार और कर्म से पहचाने जाते हैं। सहज मुस्कान, मधुर वाणी, आत्मीय व्यवहार और राष्ट्रसेवा के प्रति अदम्य समर्पण… यही पहचान थी रुपनारायण सिन्हा की। मंगलवार को बिलासपुर में आयोजित योग प्रशिक्षण एवं शाखा कार्यक्रम के बाद वे अचानक हृदयाघात का शिकार हो गए। अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका पार्थिव शरीर शांत हो चुका था। यह समाचार जैसे ही पाटन अंचल और पूरे छत्तीसगढ़ में पहुंचा, शोक की लहर दौड़ पड़ी। मंगलवार की सुबह बिलासपुर योग प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने स्वयं शाखा और योग कार्यशाला का संचालन किया। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि राष्ट्र, समाज और संगठन सेवा में सक्रिय वही व्यक्तित्व कुछ ही क्षणों बाद सदा के लिए मौन हो जाएगा। अंतिम सांस तक कर्मपथ पर डटे रहना उनके जीवन दर्शन की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
पाटन ब्लॉक के ग्राम कुम्हली निवासी श्री सिन्हा का जीवन बाल्यकाल से ही राष्ट्रभक्ति और संगठन साधना को समर्पित रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में ढले रुपनारायण सिन्हा ने स्वयंसेवक से प्रचारक तक की कठिन यात्रा तपस्वी भाव से पूरी की। बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में वर्षों तक प्रचारक रहते हुए उन्होंने राष्ट्र पुनर्निर्माण और सामाजिक जागरण का कार्य किया। रुपनारायण सिन्हा उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने “सेवा को जीवन” और “कर्म को पूजा” माना। उनका जीवन संघ परंपरा के उस आदर्श का जीवंत उदाहरण रहा, जहां व्यक्ति स्वयं से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए जीता है।
उनके निधन पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, प्रदेश भाजपा और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है। वहीं सोशल मीडिया से लेकर गांव-गांव तक उनके साथ बिताए क्षणों को याद कर लोग भावुक हो रहे हैं।निस्संदेह,रुपनारायण सिन्हा का जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सामाजिक, वैचारिक और संगठनात्मक चेतना के एक जीवंत अध्याय का विराम है।
• राष्ट्रवाद और छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान का संगम थे रुपनारायण सिन्हा
पृथक छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उनकी संगठन क्षमता और समर्पण को देखते हुए उन्हें बस्तर संभाग का संगठन मंत्री बनाया। बाद में बिलासपुर संभाग में भी उन्होंने संगठन को मजबूत करने का दायित्व निभाया। वे उन विरले कार्यकर्ताओं में रहे, जिनके भीतर राष्ट्रवाद के साथ-साथ मूल छत्तीसगढ़िया अस्मिता, दलित-पिछड़ों और अंतिम पंक्ति के व्यक्ति के प्रति गहरी संवेदना थी। राजनीतिक परिस्थितियों के एक दौर में जब स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा ने उन्हें भीतर तक व्यथित किया, तब भी उन्होंने संगठन और विचारधारा का साथ नहीं छोड़ा। वे मौन साधक की तरह संघ के अन्य दायित्वों में स्वयं को पुनः समर्पित कर समाजकार्य में जुट गए। यही उनकी कर्मनिष्ठा और तप का परिचायक था।
• एसी कमरों से बाहर निकल गांव-गांव तक पहुंचाया योग का संदेश-
वर्ष 2023 में प्रदेश में विष्णुदेव साय सरकार बनने के बाद केंद्रीय संगठन ने उन्हें भाजपा संगठन और सत्ता के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। इसी दौरान उन्हें छत्तीसगढ़ योग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह दायित्व उन्होंने केवल प्रशासनिक पद की तरह नहीं निभाया, बल्कि योग को जन-जन तक पहुंचाने का जनआंदोलन बना दिया। ग्रामीण अंचलों, वनवासी क्षेत्रों, कस्बों और शहरों में लगातार भ्रमण कर वे योग की अलख जगाते रहे। राज्य गठन के बाद यह पहली बार देखा गया कि योग आयोग का अध्यक्ष वातानुकूलित कार्यालयों तक सीमित न रहकर गांव-गली तक पहुंचा और बारहों महीने योग को जनचेतना का हिस्सा बनाने में जुटा रहा।