
फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार, पिता की पुनर्विचार याचिका खारिज; बेटी को हर माह 5 हजार रुपये देने होंगे
बिलासपुऱ । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि विशेष परिस्थितियों में बालिग बेटी भी भरण-पोषण पाने की हकदार हो सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी पिता अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने एक पिता द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। इसके तहत पिता को अपनी बेटी को प्रतिमाह 5 हजार रुपये भरण-पोषण राशि देना जारी रखना होगा।
मामले में पिता ने अदालत से भरण-पोषण राशि बंद करने की मांग करते हुए दावा किया था कि युवती अब बालिग हो चुकी है और वह उसकी कानूनी पत्नी से जन्मी संतान नहीं है। हालांकि सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2016 से बेटी को नियमित रूप से भरण-पोषण राशि दी जा रही थी और इस आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई थी। हाईकोर्ट ने पिता की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वर्षों तक आदेश का पालन करने के बाद अब बेटी की वैधता और संबंधों पर सवाल उठाना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने माना कि यह तर्क बहुत देर से उठाया गया है और इसका कोई ठोस आधार नहीं है।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी मामले में पहले से भरण-पोषण का आदेश प्रभावी हो और उसे लंबे समय तक चुनौती न दी गई हो, तब बाद में संबंधों की वैधता का मुद्दा उठाकर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पिता का दायित्व केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक भी है। ऐसे मामलों में बेटी के जीवनयापन और उसके अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। इस फैसले को भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, जो बालिग बेटियों के अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत करता है