
रायपुर, 24सितम्बर 2026। छत्तीसगढ़ में धान उपार्जन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में राज्य शासन ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। धान की खेती के वास्तविक क्षेत्रफल के सटीक आकलन और तकनीकी सत्यापन के लिए खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के बीच मंत्रालय महानदी भवन में समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। इस पहल के तहत सेटेलाइट आधारित मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक डेटा का समन्वित उपयोग किया जाएगा। इसका उद्देश्य खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में धान की फसल के वास्तविक रकबे का अधिक सटीक आकलन करना है, जिससे धान उपार्जन व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी एवं सुदृढ़ बनाया जा सके।
FRA और डुबान क्षेत्रों की भी होगी डिजिटल मैपिंग
तकनीकी सर्वे के अंतर्गत वर्तमान में डिजिटल रूप से मैप नहीं किए गए गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों की पहचान की जाएगी। विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आबंटित भूमि तथा डुबान क्षेत्रों में स्थित कृषि भूमि की मैपिंग कर उनकी GIS आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी।
सेटेलाइट इमेजरी से होगी धान की फसल की पुष्टि
तैयार की गई पॉलीगॉन लेयर और भू-स्थानिक डेटा के आधार पर खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए धान के वास्तविक रकबे का आकलन किया जाएगा। जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों में खसरों के अक्षांश-देशांतर का सेटेलाइट इमेजरी से मिलान कर संबंधित भूमि पर धान की फसल की डिजिटल उपस्थिति का सत्यापन किया जाएगा। इस तकनीकी व्यवस्था से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों, विशेषकर FRA एवं डुबान क्षेत्र की कृषि भूमि की डिजिटल पहचान मजबूत होगी। साथ ही भविष्य में डिजिटल क्रॉप सर्वे के लिए एक मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार होगा।
एमओयू के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, विभाग की संचालक डॉ. फरिहा आलम तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संचालक कवीश्वर उपस्थित रहे।
मुख्य बात: अब धान के रकबे के आकलन में पारंपरिक प्रक्रिया के साथ सेटेलाइट इमेजरी और GIS तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे उपार्जन व्यवस्था में आंकड़ों की सटीकता और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में मदद मिलेगी।