
कुलपति प्रो. मनोज दयाल बोले— व्याकरण ही नहीं, सत्यता, संतुलन और वस्तुनिष्ठता ही भाषा की वास्तविक शुचिता
रायपुर, 2 अगस्त 2026। हिंदी साहित्य के महान कथाकार एवं पत्रकारिता के पुरोधा मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए ‘बौद्धिक विमर्श इकाई’ का गठन किया गया। इस अवसर पर “सार्वजनिक जीवन में भाषा की शुचिता” विषय पर राष्ट्रीय स्तर का विशेष विमर्श आयोजित किया गया, जिसमें भाषा की गरिमा, सत्यता और संवाद की मर्यादा पर गहन चर्चा हुई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. मनोज दयाल ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्यिक एवं पत्रकारिता योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी से समाज की विसंगतियों पर प्रहार किया और आमजन की सहज-सरल भाषा को साहित्य के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि आज भाषा की शुचिता केवल व्याकरणिक शुद्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सत्यता, वैचारिक संतुलन और वस्तुनिष्ठता का समावेश होना आवश्यक है। उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन में सकारात्मक संवाद समाज को जोड़ता है, जबकि अमर्यादित और कलुषित भाषा सामाजिक विभाजन का कारण बनती है।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव सुनील शर्मा ने कहा कि प्रभावी संवाद वही है, जो श्रोता की समझ, संवेदनशीलता और गरिमा का सम्मान करते हुए किया जाए। सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति की भाषा ही उसके व्यक्तित्व और विचारों का प्रतिबिंब होती है। कार्यक्रम में वरिष्ठ आचार्यों ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डिजिटल युग और सोशल मीडिया की बढ़ती सक्रियता के बीच भाषा में संयम, मर्यादा और संतुलन बनाए रखना पत्रकारिता और समाज दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि नवगठित ‘बौद्धिक विमर्श इकाई’ के माध्यम से अब नियमित रूप से समकालीन और ज्वलंत विषयों पर विचार-विमर्श एवं परिचर्चाओं का आयोजन किया जाएगा, जिससे विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के बीच स्वस्थ वैचारिक संवाद और बौद्धिक संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। इस अवसर पर डॉ. शैलेंद्र खंडेलवाल, डॉ. आशुतोष मंडावी, डॉ. नृपेंद्र शर्मा, डॉ. राजेंद्र मोहंती तथा पत्रकारिता विभागाध्यक्ष पंकज नयन पांडेय सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।