
11वीं से 13वीं शताब्दी के दुर्लभ शिलालेख और पांडुलिपियां मिलीं,
रायपुर। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा संचालित ‘ज्ञानभारतम् मिशन’ के तहत छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी बड़ी उपलब्धि सामने आई है। जिले में चल रहे व्यापक सर्वेक्षण के दौरान कई प्राचीन शिलालेख और दुर्लभ पांडुलिपियां खोजी गई हैं, जिन्हें बस्तर क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जा रहा है।वन एवं जिले के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप ने इस ऐतिहासिक खोज पर खुशी जताते हुए जिला प्रशासन और सर्वेक्षण टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह पहल बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और परंपराओं को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी।
दंतेवाड़ा कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव के निर्देशन में जिले में मिशन का प्रभावी संचालन किया जा रहा है।
जिला नोडल अधिकारी और एसडीएम के नेतृत्व में मास्टर ट्रेनर्स, विकासखंड स्तरीय अधिकारियों और शिक्षकों की टीम ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थलों का गहन सर्वेक्षण कर रही है।
सर्वेक्षण के दौरान समलूर के शिव मंदिर से 11वीं शताब्दी के दुर्लभ तेलुगु और देवनागरी शिलालेख मिले हैं। वहीं मंदिर परिसर से 18वीं से 20वीं शताब्दी के बीच की देवनागरी लिपि में लिखित एक प्राचीन पांडुलिपि भी बरामद हुई है। बारसूर के प्रसिद्ध मामा-भांजा मंदिर से 1060 से 1068 ईस्वी के बीच का महत्वपूर्ण तेलुगु शिलालेख प्राप्त हुआ है। इसके अलावा दंतेश्वरी मंदिर में 13वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के दो प्राचीन शिलालेख मिले हैं, जिनमें तेलुगु और देवनागरी दोनों लिपियों का मिश्रित प्रयोग देखने को मिला है।
आंवराभाटा क्षेत्र में एक दुर्लभ ताड़पत्र पांडुलिपि भी मिली है, जिसके बारे में प्रारंभिक अनुमान है कि यह 150 से 300 वर्ष पुरानी हो सकती है और इसमें ओडिया लिपि का प्रयोग किया गया है। जिला प्रशासन अब इन सभी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण, डिजिटलाइजेशन और दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। ज्ञानभारतम् मिशन के माध्यम से दंतेवाड़ा और बस्तर का समृद्ध इतिहास अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान हासिल कर रहा है।