रायगढ़, 17 मई: 65 वर्षीय ध्याना बाई बरेठ की आंखों में अब आंसू नहीं बचें। बेघर जीवन, गरीबी की मार और सिस्टम की बेरुखी ने उनकी उम्मीदों को लगभग कुचल दिया है। रायगढ़ के चक्रधर नगर की रहने वाली ध्याना बाई आज रायपुर की सड़कों पर शनि मंदिर के पास खुले आसमान के नीचे, धूप-बारिश झेलती हुई रहने को मजबूर हैं — बस एक बैग और उसमें कुछ कपड़े, सरकारी चिट्ठियां और उम्मीदें।
प्रधानमंत्री से लेकर डिप्टी सीएम तक को लिख चुकीं चिट्ठी
ध्याना बाई अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृह मंत्री विजय शर्मा और डिप्टी मुख्यमंत्री अरुण साव तक को कई बार पत्र लिख चुकी हैं। मकसद बस एक ही — प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उन्हें एक छोटा सा घर मिल जाए। पर अभी तक घर तो दूर, उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगी है।
मकान मिला, पर कीमत बन गई रुकावट
नगर निगम रायगढ़ की ओर से उन्हें “मोर मकान मोर आस” योजना के तहत चंद्रनगर परियोजना में ब्लॉक D के मकान नंबर 23 के लिए लॉटरी में चुना गया था। लेकिन इसके लिए शर्त रखी गई कि उन्हें 2 लाख 73 हजार रुपये की राशि जमा करनी होगी — एकमुश्त। इस बुजुर्ग महिला के लिए यह रकम इकट्ठा करना नामुमकिन था। उनकी आय का एकमात्र जरिया वृद्धा पेंशन है, जिससे दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है।
मंत्रियों के बंगलों के बाहर घंटों बैठती हैं
ध्याना बाई हर महीने जैसे-तैसे ट्रेन पकड़कर रायपुर आती हैं। मंत्रियों के घरों के बाहर घंटों इंतजार करती हैं। कभी गार्ड कहता है मंत्री नहीं हैं, कभी उन्हें बिना जवाब के लौटा दिया जाता है। वे कहती हैं, “बस सरकार जीते जी एक छोटा सा घर दे दे, मरने के बाद वो घर सरकार वापस ले ले, यही मेरी आखिरी ख्वाहिश है।”
पति ने छोड़ा, समाज ने भी नहीं थामा हाथ
ध्याना बाई की कहानी सिर्फ गरीबी की नहीं, बेबसी और सामाजिक उपेक्षा की भी है। सालों पहले उनके पति ने उन्हें मारपीट कर छोड़ दिया। तब से वह बेसहारा हैं। कभी चोर उनका बैग टटोलते हैं, तो कभी छेड़छाड़ का शिकार होती हैं। मजदूरी की तलाश में जम्मू-कश्मीर तक गईं, जहां उनकी बची-खुची जमा पूंजी भी चोरी हो गई। अब वे एक साल से रायगढ़ और रायपुर के बीच भटक रही हैं — उम्मीद है कि कोई उनकी बात सुनेगा।
प्रशासनिक उपेक्षा और सिस्टम की चुप्पी
नगर निगम के दफ्तरों के कई चक्कर काटने के बाद भी उन्हें मकान नहीं मिला। अफसर कहते हैं — “पैसे दो, मकान लो।” जब वे बार-बार गुहार लगाती हैं, तो कई बार उन्हें दफ्तर से भगा दिया जाता है। उनके पास मौजूद सरकारी पत्र साफ तौर पर बताता है कि वे लॉटरी में चयनित हैं — लेकिन गरीबी उनके लिए दीवार बन गई है।
आज जब हम “सशक्त भारत” की बात करते हैं, तो ध्याना बाई जैसी महिलाएं सवाल बनकर खड़ी हो जाती हैं। सवाल — क्या एक गरीब बुजुर्ग को जीवन के अंतिम पड़ाव में सिर्फ एक घर मिलना भी इतना कठिन है?