YC न्यूज़ डेस्क । छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ से लेकर झारखंड और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों तक फैले नक्सली संगठन में इन दिनों भारी उथल-पुथल मची हुई है। सूत्रों के अनुसार, आत्मसमर्पण और शांति वार्ता के मुद्दे पर संगठन दो हिस्सों में बंट गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा “31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने” के ऐलान के बाद से माओवादी नेतृत्व में असमंजस और टकराव तेज हो गया है। पिछले एक महीने में संगठन की केंद्रीय और राज्य समितियों की ओर से कुल आठ पत्र जारी किए गए हैं, जिनमें कुछ ने शांति वार्ता का समर्थन किया है, तो कुछ ने इसका खुला विरोध किया है।
हाल ही में पोलित ब्यूरो सदस्य भूपति उर्फ सोनू ने केंद्र और राज्य सरकारों को सीजफायर और वार्ता का प्रस्ताव भेजा था। इस पहल का माड़ डिविजन समेत कई स्थानीय प्रवक्ताओं ने समर्थन किया। लेकिन इसी बीच, नारायणपुर जिले के माड़ क्षेत्र में भूपति के मुठभेड़ में मारे जाने से दो दिन पहले, संगठन की केंद्रीय समिति के प्रवक्ता विकल्प और अभय ने संयुक्त पत्र जारी कर इसे उनकी “निजी राय” बताया।
पत्र में कहा गया कि — “अगर सोनू आत्मसमर्पण करना चाहता है तो करे, पर संगठन के हथियार दुश्मनों को सौंपने का अधिकार किसी को नहीं है।” इसके साथ ही भूपति को संगठन की सभी जिम्मेदारियों से बर्खास्त भी कर दिया गया था।
22 सितंबर को भूपति द्वारा जारी शांति प्रस्ताव के बाद से मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। एक ओर रूपेश और उनके साथी अब हिंसा छोड़कर जनता के बीच काम करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर शीर्ष नेतृत्व अब भी सशस्त्र संघर्ष को “विचारधारा की रीढ़” मानकर उससे पीछे हटने को तैयार नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि माओवादी आंदोलन अपने सबसे गंभीर अंदरूनी संकट के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय से चली आ रही वैचारिक खाई अब संगठन के टूटने का कारण बन सकती है।