रायपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में महिला पुलिसकर्मी से बर्बरता का वीडियो सामने आने के बाद पूरे इलाके में गम और गुस्से का माहौल है। इस घटना से पुलिस बल के साथ-साथ ग्रामीणों में भी भारी आक्रोश देखा जा रहा है। घटना की निंदा करते हुए ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। फिलहाल स्थिति यह है कि गांवों में डर का माहौल है और लोग हर अजनबी को शक की नजर से देख रहे हैं। घटना के बाद पुलिस बेहद संभलकर कार्रवाई कर रही है। आदिवासी समुदाय से जुड़ा मामला होने के कारण पुलिस और प्रशासन किसी भी तरह का नया विवाद खड़ा नहीं करना चाहते। हालांकि, पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अफसर यह स्वीकार कर रहे हैं कि वे समय रहते उभरते विद्रोह को भांप नहीं पाए। जब तक खुफिया तंत्र सक्रिय हुआ, तब तक हालात बेकाबू हो चुके थे।
पेट्रोल बम से बढ़ी चिंता, बाहरी हाथ की आशंका–
इस घटना में पहली बार कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा पेट्रोल बम का इस्तेमाल किया गया, जिससे पुलिस को हिंसा भड़काने में बाहरी तत्वों की संलिप्तता की आशंका है। इसी दिशा में जांच तेज कर दी गई है। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि सुनियोजित तरीके से माहौल को हिंसक बनाया गया।
पुलिस और प्लांट स्टाफ को भारी नुकसान–
हिंसा के दौरान पुलिस के करीब एक दर्जन अधिकारी-कर्मचारी घायल हुए हैं, जिनमें दो टीआई, एक एसआई सहित अन्य जवान शामिल हैं। वहीं जिंदल के तमनार प्लांट के भी लगभग इतने ही कर्मचारी घायल बताए जा रहे हैं। इस पूरी घटना में 30 से 40 करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन किया गया है। स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए पुलिस ने प्लांट क्षेत्र में एक अस्थायी चौकी स्थापित की है, ताकि दोबारा कोई अंदर प्रवेश न कर सके। हिंसा और तोड़फोड़ में शामिल कई लोग फिलहाल फरार हैं, जिनकी तलाश की जा रही है।
तमनार की घटना से निवेश को झटका–
तमनार की यह घटना राज्य सरकार की औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने की कोशिशों के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है। निवेश के लिए कानून-व्यवस्था का मजबूत होना बेहद जरूरी है। ऐसी घटनाओं से निवेशक कंपनियों का भरोसा डगमगाता है और वे पीछे हट सकती हैं। ऐसे में शासन-प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया है कि हर हाल में शांति बहाल की जाए और ग्रामीणों का भरोसा दोबारा जीता जाए।
इन कारणों से भड़का पूरा मामला–
अफवाहों से भड़के लोग: गारे पेलमा सेक्टर-1 में प्रस्तावित ओपन कास्ट और अंडरग्राउंड माइनिंग को लेकर गांवों में अफवाह फैल गई कि घरों के नीचे भी खनन होगा और मुआवजा नहीं मिलेगा। साथ ही मुआवजा राशि चार गुना नहीं दिए जाने की चर्चा से आक्रोश बढ़ गया।
संवाद और समन्वय का अभाव: ग्रामीणों की नाराज़गी सामने आने के बावजूद जिंदल प्रबंधन और प्रशासन की ओर से समय रहते संवाद नहीं किया गया। अफवाहों को दूर करने की कोशिश नहीं हुई, जिससे 14 गांवों के लोग धीरे-धीरे एकजुट हो गए।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर अविश्वास: आंदोलन बढ़ने के बावजूद ग्रामीण प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की बात मानने को तैयार नहीं हुए। अविश्वास ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भड़की हिंसा: 27 दिसंबर को जब भीड़ बढ़ी तो पुलिस-प्रशासन ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लोगों को पकड़ना शुरू किया। इससे भीड़ और उग्र हो गई। स्थानीय नेता मौके से गायब हो गए और भीड़ नेतृत्वहीन हो गई, जिसके बाद हालात पूरी तरह बेकाबू हो गए।
फिलहाल तमनार में शांति बहाल करने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन यह घटना प्रशासनिक तैयारियों, संवाद की कमी और कानून-व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है