
YCन्यूज डेस्क | जगदलपुर -बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के साथ उन गांवों में फिर से शिक्षा की रोशनी लौट रही है, जहां दो दशक पहले नक्सलियों ने स्कूलों को निशाना बनाकर बच्चों को पढ़ाई से दूर कर दिया था। वर्ष 2005-06 में सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिलों में नक्सलियों ने 123 स्कूलों को बम विस्फोट या आगजनी के जरिए तबाह कर दिया था। इनमें से अब तक 93 स्कूल दोबारा शुरू किए जा चुके हैं। शिक्षा विभाग के अनुसार, वर्ष 2024 में 41 बंद स्कूलों को फिर से खोला गया, जबकि वर्ष 2026 में लंबे समय से बंद पड़े 52 और स्कूलों में पढ़ाई शुरू हो गई है। इन स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चों ने प्रवेश लिया है। अब विभाग ने इन्हीं नक्सल प्रभावित इलाकों में 80 नए स्कूल खोलने का प्रस्ताव शासन को भेजा है। मंजूरी मिलने पर इनका निर्माण वीवीजीरामजी योजना के तहत किया जाएगा।
यहां प्रस्तावित हैं नए स्कूल
- बीजापुर – 35
- सुकमा – 19
- नारायणपुर – 25
- दंतेवाड़ा – 01
जिन स्कूलों को मिटाना चाहते थे नक्सली, वहीं फिर शुरू हुई पढ़ाई
बस्तर में स्कूलों का दोबारा खुलना नक्सल प्रभावित गांवों में बदलते हालात का बड़ा संकेत माना जा रहा है। कभी जिन भवनों को नक्सलियों ने सरकारी व्यवस्था का प्रतीक मानकर उड़ाया था, आज उन्हीं क्षेत्रों में बच्चों की पढ़ाई फिर से शुरू हो रही है। वर्ष 2024 में खुले 41 स्कूलों में 532 बच्चों ने प्रवेश लिया, जबकि 2026 में शुरू हुए 52 स्कूलों में एक हजार से अधिक बच्चों का दाखिला हो चुका है। शिक्षा विभाग का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अब शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और लोग अपने गांव में स्कूल की मांग कर रहे हैं। हाल ही में सुकमा जिले के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में कलेक्टर के दौरे के दौरान भी ग्रामीणों ने प्राथमिक स्कूल खोलने की मांग रखी थी।
नक्सलियों ने स्कूलों को क्यों बनाया निशाना
विशेषज्ञों के अनुसार, नक्सली स्कूलों को केवल पढ़ाई की जगह नहीं मानते थे। वे इन्हें गांवों में सरकार की मौजूदगी का प्रतीक समझते थे। स्कूलों के माध्यम से शिक्षक पहुंचते थे, सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलती थी और प्रशासनिक गतिविधियां गांवों तक पहुंचती थीं। इसलिए इन भवनों को निशाना बनाकर नक्सली ग्रामीणों को सरकारी व्यवस्था से अलग-थलग रखना चाहते थे।
बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा सबसे बड़ा असर
स्कूल बंद होने से सबसे अधिक नुकसान बच्चों की शिक्षा को हुआ। छोटे बच्चों को दूर-दराज के स्कूलों तक जाना पड़ता था। नक्सल प्रभावित इलाकों में खराब सड़क, आवागमन और सुरक्षा संबंधी समस्याओं के कारण हजारों बच्चे वर्षों तक नियमित पढ़ाई से वंचित रहे। कई परिवारों ने बच्चों को छात्रावासों में भेजना शुरू किया, लेकिन यह व्यवस्था सभी के लिए पर्याप्त नहीं थी। इससे बच्चों और माता-पिता के बीच दूरी बढ़ी और शिक्षा का निरंतरता प्रभावित हुई।
शिक्षा विभाग ने क्या कहा
शिक्षा विभाग के संयुक्त संचालक एचआर सोम ने बताया कि शासन की प्राथमिकता केवल बंद स्कूलों को खोलना नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रों में शिक्षा का स्थायी नेटवर्क तैयार करना है जहां वर्षों तक शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित रहीं। उन्होंने कहा कि सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद अब स्कूल संचालन, शिक्षकों की नियुक्ति और आधारभूत सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
बदलते बस्तर की तस्वीर
एक समय बस्तर के जिन गांवों में स्कूलों के खंडहर नक्सली हिंसा की कहानी कहते थे, वहीं अब नए भवनों, बच्चों की उपस्थिति और ग्रामीणों की मांगों के साथ शिक्षा व्यवस्था फिर से मजबूत होती दिखाई दे रही है। 80 नए स्कूलों का प्रस्ताव इस बात का संकेत है कि बस्तर में विकास और शिक्षा को लेकर विश्वास धीरे-धीरे लौट रहा है।