दुर्ग। शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत कमजोर वर्ग एवं वंचित समूह के बच्चों को निजी स्कूलों में नि:शुल्क प्रवेश देने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में आवेदनों के रिजेक्ट होने के मामले पर अब पुनः विचार किया जाएगा। दुर्ग सांसद विजय बघेल ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर को पत्र लिखकर 6.5 हजार रिजेक्ट आवेदनों की फिर से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
सांसद बघेल ने पत्र में लिखा है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार है, जिसे प्रक्रिया की त्रुटियों के कारण रोका नहीं जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि दस्तावेजों की त्रुटियों, फोटो प्रमाण पत्र की विसंगतियों, जन्म प्रमाणपत्र, मोबाइल नंबर अथवा अन्य तकनीकी कारणों से हजारों बच्चों के आवेदन निरस्त कर दिए गए, जिससे गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
हाईकोर्ट की फटकार के बाद बैकफुट पर आया शिक्षा विभाग
जानकारी के अनुसार, जिला शिक्षा विभाग ने आरटीई के तहत इस सत्र में लगभग 12069 आवेदन प्राप्त किए थे, जिनमें से प्रथम चरण में 2775 बच्चों को प्रवेश दिया गया, वहीं दूसरे चरण में 1714 बच्चों को लाभ मिला। शेष 6.5 हजार आवेदन विविध त्रुटियों की वजह से खारिज कर दिए गए। इस पर कई अभिभावकों ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की, जिसमें कोर्ट ने शिक्षा विभाग को कड़ी फटकार लगाई और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
सांसद ने जताई चिंता, दोहराई निष्पक्ष जांच की मांग
सांसद विजय बघेल ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पात्र बच्चों को मात्र तकनीकी कारणों से वंचित किया जा रहा है। उन्होंने कलेक्टर एवं जिला शिक्षा अधिकारी से आग्रह किया है कि सत्र 2025-26 के रिजेक्ट सभी आवेदनों की सम्यक् और निष्पक्ष जांच की जाए, ताकि किसी भी योग्य बच्चे को शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहना पड़े। उन्होंने इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग, मुख्यमंत्री सचिवालय एवं जिला शिक्षा अधिकारी को प्रतिलिपि भेजते हुए शीघ्र आवश्यक कार्रवाई की अपेक्षा जताई है।