रायपुर। प्रदेश की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू की गई महात्मा गांधी रूरल इंडस्ट्रियल पार्क (रीपा) योजना अब विफलता की मिसाल बन गई है। 260 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद राज्यभर में 300 से अधिक रीपा यूनिट्स या तो बंद हो चुकी हैं या शुरू ही नहीं हो पाईं। इस बात का खुलासा पांच वरिष्ठ IAS अधिकारियों की 1000 पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट में हुआ है। सरकार की योजना भले ही गांधी जयंती पर ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन बिना योजना, डेटा और जमीन की हकीकत समझे लागू की गई यह योजना जनधन, श्रम और संसाधनों की बर्बादी बन गई। अब यह रिपोर्ट आने के बाद राज्य में जवाबदेही तय करने की मांग भी उठ रही है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की रीपा योजना (RIPA Scheme) में अनियमितताओं को लेकर प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। शासन स्तर पर जांच के बाद रायपुर संभाग आयुक्त महादेव कावरे ने गंभीर लापरवाही पाए जाने पर 3 पंचायत सचिवों को निलंबित कर दिया है, वहीं 3 जनपद पंचायत सीईओ को शो-कॉज नोटिस जारी किया गया है।
बिना प्लानिंग के शुरू हुई योजना
रिपोर्ट के मुताबिक, रीपा योजना को लागू करने से पहले न तो कच्चे माल की उपलब्धता का आंकलन हुआ और न ही कोई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की गई। इसके कारण महंगी मशीनें बंद डिब्बों में पड़ी हैं और तैयार प्लांट बेकार हो चुके हैं।
रोजगार की उम्मीद टूटी, मशीनें धूल फांक रहीं
योजना के तहत बनाए गए पार्कों में साबुन, अगरबत्ती, बेकरी, मशरूम उत्पादन, ब्रिक निर्माण, मिल्क चिलिंग यूनिट्स जैसी परियोजनाएं शुरू की गई थीं। लेकिन इन इकाइयों को न बाजार मिला और न ही संचालन के लिए जरूरी तकनीकी स्टाफ। करीब 10 हजार ग्रामीणों को जो रोजगार मिलने वाला था, वह सपना भी अधूरा रह गया।
जांच में सामने आईं ये 9 बड़ी खामियां:
- प्रोडक्ट को बाजार नहीं मिला
- कोई विजन डॉक्यूमेंट नहीं था
- ग्रामीणों को जानकारी नहीं दी गई
- केवल मजदूरी तक सीमित रखा गया
- टेक्निकल सपोर्ट एजेंसियों की विफलता
- मशीनों का गलत चयन
- बिजली की अनुपलब्धता
- हितग्राही अनुबंध नहीं हुए
- मार्केटिंग व ब्रांडिंग नहीं हुई
सर्वे और DPR के नाम पर 15 करोड़ खर्च, फिर भी ज़मीनी काम नहीं
सरकार ने रीपा यूनिट्स की योजना और स्थापना के लिए टेक्निकल सपोर्ट एजेंसियों (TSA) को 15 करोड़ रुपये दिए थे। हर TSA को एक यूनिट के लिए 5 लाख रुपये दिए गए थे ताकि वह सर्वे और DPR तैयार करें। लेकिन जांच में सामने आया कि अधिकांश एजेंसियों ने सर्वे किए बिना ही मशीनें लगवा दीं। कई जगह प्रोजेक्ट मैनेजर तक की नियुक्ति नहीं हुई।
ग्राउंड रिपोर्ट से कुछ उदाहरण:
- सेरीखेड़ी (रायपुर): साबुन, अगरबत्ती, गुलाल और मशरूम यूनिट्स बंद। मशीनें धूल खा रही हैं।
- कांपा (महासमुंद): ईंट और पेवर ब्लॉक यूनिट्स लगाई गईं, उपयोगिता का मूल्यांकन ही नहीं हुआ।
- बिरकोनी (महासमुंद): 5.5 लाख की मिल्क चिलिंग यूनिट और सेनेटरी नैपकिन मशीनें बंद पड़ी हैं।
रीपा प्रोजेक्ट के आंकड़े:
- ₹600 करोड़ का कुल प्रावधान
- ₹441 करोड़ का बजट आवंटन
- ₹260 करोड़ अब तक खर्च
- 146 ब्लॉकों में 300 यूनिट्स स्थापित
- अधिकांश प्लांट बंद या निष्क्रिय