मुकेश सेन /पाटन। मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा करने की भावना के साथ पुरातात्विक ग्राम तरीघाट निवासी ताम्रध्वज सिन्हा ने मरणोपरांत देहदान का संकल्प लिया है। उनका यह निर्णय चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में योगदान देने के साथ समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की प्रेरक पहल है। ताम्रध्वज सिन्हा का कहना है कि मृत्यु के बाद भी उनका शरीर समाज के काम आ सके, इससे बड़ा योगदान क्या हो सकता है। इसी भावना के साथ उन्होंने अपनी देह को चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया है, ताकि मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी मानव शरीर की संरचना का व्यावहारिक अध्ययन कर सकें और भविष्य में चिकित्सा के क्षेत्र में अपने ज्ञान एवं कौशल को विकसित कर सकें।
चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान में मिलेगा योगदान
देहदान चिकित्सा शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। इससे मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना और विभिन्न अंगों का प्रत्यक्ष अध्ययन करने का अवसर मिलता है। ऐसे अध्ययन से भावी चिकित्सकों को शरीर की जटिलताओं को समझने तथा चिकित्सा ज्ञान को व्यावहारिक रूप से विकसित करने में मदद मिलती है। ताम्रध्वज सिन्हा की मंशा है कि उनके इस निर्णय से चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान को लाभ मिले तथा उनका जीवन समाप्त होने के बाद भी उनका शरीर समाज के लिए उपयोगी बना रहे।
परिवार ने भी किया संकल्प का समर्थन
ताम्रध्वज सिन्हा के इस निर्णय पर उनकी धर्मपत्नी पुष्पा सिन्हा, पुत्र हिरेन्द्र सिन्हा, हेमकुमार सिन्हा और पुत्री हेमा सिन्हा ने खुशी व्यक्त करते हुए फैसले का समर्थन किया है। परिवार का यह समर्थन दर्शाता है कि देहदान जैसे मानवीय और सामाजिक महत्व के विषय पर सकारात्मक सोच घर-परिवार से ही आगे बढ़ सकती है।
मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगी सेवा की भावना
देहदान केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि मानवता के प्रति समर्पण का भाव है। अपने शरीर को चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए दान करने का संकल्प लेकर व्यक्ति भावी चिकित्सकों के प्रशिक्षण और विज्ञान की प्रगति में योगदान दे सकता है। तरीघाट के ताम्रध्वज सिन्हा की यह पहल समाज को संदेश देती है कि सेवा की भावना जीवनकाल तक सीमित नहीं होती। अपने शरीर को चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित करने का उनका संकल्प अन्य लोगों को भी देहदान के महत्व पर विचार करने और मानवता की सेवा के लिए आगे आने की प्रेरणा देता है।