लोक संस्कृति की बुलंद आवाज हुई खामोश!पंडवानी की सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई का निधन,संघर्ष से शिखर तक का सफर बना करोड़ों कलाकारों के लिए प्रेरणा

लोक संस्कृति की बुलंद आवाज हुई खामोश!पंडवानी की सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई का निधन,संघर्ष से शिखर तक का सफर बना करोड़ों कलाकारों के लिए प्रेरणा

70 वर्ष की आयु में रायपुर एम्स में ली अंतिम सांस..
रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पंडवानी की सम्राज्ञी और पद्म विभूषण सम्मानित डॉ. तीजन बाई का शनिवार देर रात निधन हो गया। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। लंबे समय से अस्वस्थ चल रही तीजन बाई के निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला एवं सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। भिलाई के गनियारी गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी लोकगायन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। हाथ में तंबूरा, दमदार आवाज और जीवंत अभिनय के साथ महाभारत की कथाओं की उनकी प्रस्तुति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। उनकी कला भारतीय लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर बन गई।

डॉ. तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साहस और संकल्प की मिसाल रहा। पारधी समाज से आने वाली तीजन बाई को शुरुआती दौर में पंडवानी गाने के कारण सामाजिक विरोध और बहिष्कार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर विरोध को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। उन्होंने पंडवानी की पारंपरिक शैली में भी बदलाव लाते हुए महिलाओं के लिए नई राह बनाई। जहां पहले महिलाएं बैठकर पंडवानी प्रस्तुत करती थीं, वहीं तीजन बाई ने पुरुष कलाकारों की तरह खड़े होकर कापालिक शैली में प्रस्तुति देकर इतिहास रच दिया। उनकी यह पहल महिला सशक्तिकरण का भी सशक्त उदाहरण बनी।
बचपन में अपने नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनकर उनमें पंडवानी के प्रति रुचि जागी। लोकगायक उमेद सिंह देशमुख से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद उन्होंने अपनी कला के दम पर विश्वभर में सम्मान अर्जित किया और कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया।

भारतीय लोक संस्कृति में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उन्होंने दुनिया के कई देशों में भारत की लोक संस्कृति का गौरव बढ़ाया।
डॉ. तीजन बाई के निधन के साथ भारतीय लोक कला का एक स्वर्णिम अध्याय भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उनकी आवाज, उनकी कला और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।

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