लोकसभा में 54 वोट से गिरा महिला आरक्षण बिल: 21 घंटे की बहस के बाद मोदी सरकार पहली बार विधेयक पास कराने में विफल

YC न्यूज डेस्क। संसद के विशेष सत्र में पेश किया गया महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। लंबी 21 घंटे की चर्चा के बाद हुई वोटिंग में बिल को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला और यह 54 वोट से गिर गया। 528 सांसदों की मौजूदगी में हुए मतदान में 298 ने समर्थन किया, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में वोट डाले। बिल पारित होने के लिए 352 वोट जरूरी थे। यह पिछले 12 वर्षों में पहला अवसर है जब केंद्र की मोदी सरकार लोकसभा में कोई विधेयक पारित कराने में असफल रही। साथ ही, 24 साल बाद किसी सरकारी बिल की संसद में हार हुई है और 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो लोकसभा में गिरा है। सरकार द्वारा लाए गए इस बिल में लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान था। हालांकि, इसके लागू होने को परिसीमन और नई जनगणना से जोड़ा गया था, जिसके चलते इसके प्रभाव 2034 के बाद ही देखने को मिलते।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि इस बिल से जुड़े दो अन्य विधेयक—परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026—को वोटिंग के लिए पेश नहीं किया गया, क्योंकि ये मुख्य बिल से संबद्ध हैं। संख्या बल की बात करें तो एनडीए के पास कुल 293 सांसद हैं और वह केवल 5 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन ही जुटा सकी। विपक्ष को साथ लाने में सरकार असफल रही, जिससे बिल पारित नहीं हो पाया। बिल गिरने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही विपक्ष से समर्थन की अपील करते हुए कहा था कि उन्हें इसका श्रेय नहीं चाहिए। वहीं विपक्षी नेताओं ने इसे संविधान और लोकतंत्र की जीत बताया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे “संविधान पर हमले की कोशिश” करार दिया, जबकि प्रियंका गांधी ने सरकार पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया।

गृहमंत्री अमित शाह ने बिल खारिज होने पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “निंदनीय” बताया और कहा कि देश की महिलाएं इसे माफ नहीं करेंगी। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार पिछड़े वर्ग की महिलाओं को उनका अधिकार नहीं देना चाहती। विशेषज्ञों के अनुसार, बिल गिरने का सबसे बड़ा कारण इसे परिसीमन से जोड़ना रहा, जिसका दक्षिणी राज्यों ने विरोध किया। विपक्ष का तर्क है कि इससे दक्षिण भारत की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है।

आगे क्या?
सरकार अब इस बिल में संशोधन कर पुनः पेश करने या विपक्ष के साथ सहमति बनाकर नया प्रारूप लाने पर विचार कर सकती है। फिलहाल, महिला आरक्षण कानून लागू तो रहेगा, लेकिन इसका वास्तविक लाभ आगामी वर्षों में ही मिल सकेगा।

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