तहसील और एसडीएम कार्यालय में लिपिकीय अमले की कमी का असर जनता पर? जमीन, नामांतरण, बंटवारा और सीमांकन जैसे मामलों में बढ़ रही परेशानी – पाटन से जामगांव आर तक कर्मचारियों का टोटा

तहसील और एसडीएम कार्यालय में लिपिकीय अमले की कमी का असर जनता पर? जमीन, नामांतरण, बंटवारा और सीमांकन जैसे मामलों में बढ़ रही परेशानी   – पाटन से जामगांव आर तक कर्मचारियों का टोटा

पाटन। विधानसभा क्षेत्र के महत्वपूर्ण राजस्व कार्यालयों में कर्मचारियों की कमी अब प्रशासनिक व्यवस्था के साथ-साथ आम जनता की परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है। तहसील पाटन, जामगांव आर कार्यालय और एसडीएम कार्यालय में पर्याप्त लिपिकीय अमला नहीं होने की बात सामने आ रही है। आरोप यह भी है कि नियमित कर्मचारियों की कमी के बीच दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के सहारे कार्यालयीन कामकाज चलाया जा रहा है। राजस्व विभाग का काम सीधे आम नागरिकों की जमीन और अधिकारों से जुड़ा है। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, रिकॉर्ड दुरुस्ती सहित कई महत्वपूर्ण मामलों की फाइलें इन्हीं कार्यालयों से होकर गुजरती हैं। ऐसे में यदि कार्यालयों में पर्याप्त नियमित कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं तो समयबद्ध तरीके से राजस्व प्रकरणों का निराकरण कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है, यह बड़ा सवाल बन गया है।

‘जुगाड़’ से चल रही व्यवस्था तो जवाबदेही किसकी?

कर्मचारियों की कमी यदि लंबे समय से बनी हुई है तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि रिक्त पदों को भरने अथवा अतिरिक्त कर्मचारियों की व्यवस्था के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

क्या रिक्त पदों की जानकारी शासन स्तर पर भेजी गई है?
क्या अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग की गई है?
वर्तमान में कितने राजस्व प्रकरण लंबित हैं?
कितने मामले निर्धारित समयसीमा पार कर चुके हैं?
और यदि किसी प्रकरण के निराकरण में देरी हो रही है तो उसकी जवाबदेही किसकी तय हो रही है?

इन सवालों के जवाब आंकड़ों और दस्तावेजों के साथ सामने आने चाहिए।

फाइलों की रफ्तार धीमी तो जनता क्यों काटे चक्कर?

राजस्व कार्यालयों में अपने जमीन संबंधी मामलों के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले ग्रामीणों को यदि बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो यह व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है। कर्मचारियों की कमी से काम का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन उसका सीधा असर आम नागरिक के काम पर पड़े, यह चिंता का विषय है।राजस्व कार्यालय वह स्थान है जहां ग्रामीण अपनी जमीन, स्वामित्व और अन्य अधिकारों से जुड़े मामलों के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में कर्मचारी संकट के कारण यदि फाइलों के निराकरण में देरी होती है तो प्रशासनिक स्तर पर इसकी समीक्षा जरूरी हो जाती है।

रिक्त पदों का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग

अब मांग उठ रही है कि प्रशासन तहसील पाटन, जामगांव आर और एसडीएम कार्यालय की वास्तविक कर्मचारी स्थिति सार्वजनिक करे। कितने पद स्वीकृत हैं, कितने पदों पर नियमित कर्मचारी पदस्थ हैं और कितने पद रिक्त हैं—इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए। इसके अलावा वर्तमान में कितने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी कार्यरत हैं और उनसे किस प्रकृति के कार्य लिए जा रहे हैं, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

जांच हुई तो सामने आएगी व्यवस्था की पूरी तस्वीर

यदि कर्मचारियों की कमी के कारण राजस्व प्रकरणों के निराकरण में देरी हो रही है तो केवल कर्मचारियों की कमी बताना पर्याप्त नहीं होगा। रिक्त पदों, लंबित प्रकरणों, समयसीमा से बाहर मामलों और अस्थायी कर्मचारियों की भूमिका की प्रशासनिक समीक्षा की आवश्यकता है।इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि समस्या केवल मानव संसाधन की कमी है अथवा कार्यालयीन व्यवस्था के स्तर पर भी सुधार की आवश्यकता है।

जनता का सवाल—राजस्व तंत्र व्यवस्था से चलेगा या ‘जुगाड़’ से?

राजस्व विभाग आम आदमी की जमीन और अधिकारों से सीधे जुड़ा हुआ विभाग है। इसलिए यहां लंबे समय तक कामचलाऊ व्यवस्था पर निर्भरता उचित नहीं मानी जा सकती। प्रशासन को कर्मचारियों की स्थिति की समीक्षा कर आवश्यकतानुसार नियमित अमले की व्यवस्था करने और लंबित प्रकरणों की समयबद्ध समीक्षा करने की जरूरत है। सवाल यही है—बाबुओं की कमी आखिर कब दूर होगी और पाटन क्षेत्र का राजस्व तंत्र कब पूरी क्षमता के साथ काम करेगा?

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