YC न्यूज़ डेस्क । पहल्गाम आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर करारा प्रहार किया, और अब इसी अभियान का अगला चरण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरू होने जा रहा है। भारत सरकार ने पाकिस्तान को वैश्विक मंचों पर बेनकाब करने के लिए एक बड़ा कूटनीतिक अभियान छेड़ने का फैसला किया है, जिसमें एक सात सदस्यीय बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल दुनिया के प्रमुख देशों का दौरा करेगा।
इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस नेता शशि थरूर समेत बीजेपी, कांग्रेस और अन्य प्रमुख दलों के सांसद शामिल होंगे। इस कदम को पीएम मोदी की “नरसिम्हा राव डिप्लोमेसी” के तौर पर देखा जा रहा है, जो भारत की ऐतिहासिक कूटनीति की याद दिलाता है।
नरसिम्हा राव मॉडल की वापसी
इस रणनीति की प्रेरणा 1994 की उस ऐतिहासिक पहल से मिली है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने पाकिस्तान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल जेनेवा भेजा था। फारूक अब्दुल्ला, सलमान खुर्शीद और हामिद अंसारी जैसे नेताओं की मौजूदगी वाले उस दल ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। उस प्रतिनिधिमंडल की कोशिशों से भारत के खिलाफ प्रस्ताव गिर गया था और दुनिया को बताया गया कि कश्मीर भारत का आंतरिक मुद्दा है।
अब एक बार फिर भारत उसी ऐतिहासिक तर्ज पर आगे बढ़ रहा है। मोदी सरकार का यह प्रतिनिधिमंडल भारत की इस सुस्पष्ट स्थिति को दुनिया के सामने रखेगा कि आतंकवाद का मूल स्त्रोत पाकिस्तान है और वह लगातार भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तान को कूटनीतिक घेरेबंदी का सामना
सूत्रों के अनुसार, यह प्रतिनिधिमंडल अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे प्रमुख देशों का दौरा करेगा और वहां की सरकारों, थिंक टैंक्स और मीडिया के सामने भारत का पक्ष मजबूती से रखेगा। पाकिस्तान को आतंकवाद के समर्थन और घुसपैठ के प्रयासों के लिए सार्वजनिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल भारत की कूटनीतिक शक्ति का प्रदर्शन है बल्कि विश्व समुदाय को भी आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट करने की कोशिश है।
Apress की राय
भारत की यह रणनीति बहुपक्षीय समर्थन जुटाने और वैश्विक समुदाय को पाकिस्तान के असली चेहरे से रूबरू कराने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम हो सकता है। जैसा कि 1994 में हुआ था, इस बार भी अगर भारत अपने पक्ष को सटीकता और एकता के साथ प्रस्तुत करता है, तो पाकिस्तान की वैश्विक मंचों पर अलग-थलग पड़ने की प्रक्रिया और तेज हो सकती है।