आदिवासी संस्कृति का महाकुंभ बना बस्तर पण्डुम 2026, 54 हजार से अधिक पंजीयन से रचा इतिहास

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपरा और लोककला को विश्व पटल पर स्थापित करने वाला बस्तर पण्डुम 2026 इस वर्ष ऐतिहासिक रूप ले चुका है। पारंपरिक नृत्य, संगीत, वेशभूषा, लोकशिल्प, आंचलिक साहित्य और जनजातीय खान-पान का अनूठा संगम बने इस महोत्सव में इस वर्ष 54 हजार से अधिक प्रतिभागियों का पंजीयन दर्ज किया गया है, जो अपने आप में एक नया कीर्तिमान है। बस्तर पण्डुम केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा और अस्मिता का जीवंत उत्सव है। यह आयोजन स्थानीय कलाकारों को मंच देने के साथ युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन चुका है। विभिन्न अंचलों से आए प्रतिभागी बस्तर की 12 पारंपरिक सांस्कृतिक विधाओं का प्रदर्शन करेंगे।
54 हजार से अधिक पंजीयन, उत्साह ने तोड़े सभी रिकॉर्ड
आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में जहां विकासखंड स्तर पर 15,596 प्रतिभागियों ने भाग लिया था, वहीं इस वर्ष यह संख्या तीन गुना से अधिक बढ़कर 54,745 तक पहुंच गई है। दंतेवाड़ा जिला 24,267 पंजीयन के साथ संभाग में शीर्ष पर रहा, जबकि कांकेर, बीजापुर और सुकमा जिलों से भी हजारों कलाकारों की सहभागिता दर्ज की गई है। यह बढ़ती भागीदारी बस्तरवासियों की अपनी संस्कृति के प्रति गहरी चेतना और गर्व को दर्शाती है।
7 से 9 फरवरी तक संभाग स्तरीय आयोजन
संभाग स्तरीय बस्तर पण्डुम 07 से 09 फरवरी 2026 तक आयोजित किया जाएगा। जिला स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद चयनित 84 दलों के 705 कलाकार इन तीन दिनों में अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। जनजातीय नृत्य, पारंपरिक गीतों की गूंज और नाट्य प्रस्तुतियां इस आयोजन का मुख्य आकर्षण रहेंगी।
वाद्ययंत्र, व्यंजन और शिल्प का अनोखा संगम
प्रतियोगिता में 12 विधाओं का प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें 192 कलाकार जनजातीय नृत्य और 134 कलाकार जनजातीय नाटक में भाग लेंगे। 65 कलाकार पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर धुन छेड़ेंगे, जबकि 56 प्रतिभागी जनजातीय व्यंजनों के माध्यम से बस्तर के स्वाद से परिचय कराएंगे। साथ ही वन औषधियों, चित्रकला, शिल्पकला, आभूषण और आंचलिक साहित्य का भी प्रदर्शन होगा।
मातृशक्ति की मजबूत भागीदारी

बस्तर पण्डुम 2026 में महिला सहभागिता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। संभाग स्तर पर चयनित 705 प्रतिभागियों में 340 महिलाएं और 365 पुरुष शामिल हैं। यह संतुलन दर्शाता है कि बस्तर की संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अग्रसर हैं।

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