उद्यानिकी विभाग में वर्मी कम्पोस्ट खरीदी में बड़ा घोटाला ! 2 हजार का सामान 16,500 में, तीन फर्म बनाकर टेंडर में खेल

रायपुर। छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी विभाग में वर्मी कम्पोस्ट खरीदी को लेकर बड़े गोलमाल का मामला सामने आया है। धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष योजना के तहत वर्ष 2025-26 के लिए मिले बजट में टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। प्राथमिक जांच में खुलासा हुआ है कि करीब 2 हजार रुपए कीमत वाले वर्मी बेड को 16,500 रुपए में खरीदने का वर्क ऑर्डर जारी कर दिया गया। जानकारी के मुताबिक, योजना के तहत 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, जिसमें से 2.52 करोड़ रुपए की पहली किस्त जारी हुई। इस राशि से 15 जिलों में वर्मी कम्पोस्ट खरीदी की प्रक्रिया शुरू की गई। आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस तरह बनाई गईं कि एक ही मालिक की तीन अलग-अलग कंपनियां ही इसमें भाग ले सकें। मामला उजागर होने के बाद 7 जिलों ने टेंडर प्रक्रिया को रद्द कर दिया, जबकि 8 जिलों—बलरामपुर, जशपुर, महासमुंद, धमतरी, खैरागढ़, मोहला-मानपुर, कांकेर और सुकमा—में खरीदी की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इन जिलों में कुल 1.70 करोड़ रुपए की खरीदी प्रस्तावित थी।

जांच में सामने आया कि एआर इंटरप्राइजेज, आर्मी इंफोटेक और विश कंप्यूटर्स नाम की तीन कंपनियों ने टेंडर में हिस्सा लिया, लेकिन इनके दस्तावेजों की पड़ताल में ये एक ही समूह से जुड़ी पाई गईं। सुकमा जिले में एआर इंटरप्राइजेज को 16,500 रुपए प्रति यूनिट की दर से टेंडर दिया गया, जबकि अन्य कंपनियों ने इससे भी अधिक दरें पेश की थीं। विशेषज्ञों के अनुसार, एक वर्मी कम्पोस्ट यूनिट की वास्तविक लागत 10 हजार रुपए से अधिक नहीं होती, जबकि जेम पोर्टल पर वर्मी बेड 1500 से 2000 रुपए तक उपलब्ध हैं। अधिकारियों ने सफाई देते हुए कहा कि 16,500 रुपए में दो वर्मी बेड, केंचुए, कवर और शेड नेट शामिल हैं, लेकिन जानकारों ने इस दावे पर भी सवाल उठाए हैं।

गड़बड़ी सामने आने के बाद उद्यानिकी विभाग के संचालक लोकेश चंद्राकर ने खरीदी प्रक्रिया पर रोक लगा दी है और जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी और यदि अनियमितता साबित हुई तो संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, बलरामपुर और जशपुर जिलों में जल्दबाजी में खरीदी कर ली गई है, जहां करीब 18-18 लाख रुपए के बिल भी लगाए जा चुके हैं। यह मामला न केवल सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत और फर्जी कंपनियों के जरिए सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका को भी उजागर करता है।

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