बृजभूषण शरण सिंह पॉक्सो केस में बरी, वकील बोले- राजनीति से प्रेरित थी साजिश, मामला पहले दिन से कमजोर था

नई दिल्ली – भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज केस को बंद कर दिया है। यह फैसला दिल्ली पुलिस द्वारा दायर की गई क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर लिया गया, जिसमें कहा गया था कि आरोप प्रमाणित नहीं हो पाए हैं।

बृजभूषण शरण सिंह पर 2023 में कुल 7 महिला पहलवानों ने यौन शोषण का आरोप लगाया था, जिनमें एक नाबालिग रेसलर भी शामिल थीं। पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज यही मामला अब अदालत द्वारा बंद कर दिया गया है।

वकील एपी सिंह का बयान: साजिशन किया गया था केस
बृजभूषण के वकील एपी सिंह ने कोर्ट के फैसले को न्याय की जीत बताते हुए कहा, “हमें पहले दिन से भरोसा था कि यह मामला अदालत में टिकेगा नहीं। यह पूरी तरह से भारतीय कुश्ती महासंघ पर कब्जा करने की एक सुनियोजित साजिश थी।” उन्होंने दावा किया कि केस के पीछे राजनीतिक एजेंडा था और आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं था।

परिवार ने भी माना आरोप झूठा था
दैनिक भास्कर से बातचीत में नाबालिग रेसलर के पिता और दादा ने भी केस को साजिश बताया। दादा ने कहा, “मेरी पोती नाबालिग नहीं थी, और उसके साथ कुछ गलत नहीं हुआ। मेरा बेटा बहकावे में आ गया था। हमने खुद कोर्ट में बयान दिए और केस खत्म किया।” उन्होंने इसके पीछे पहलवान विनेश फोगाट का नाम लिया और आरोप लगाया कि पूरा मामला उनके द्वारा रचा गया षड्यंत्र था।

चार अहम बिंदु जो केस को कमजोर करते हैं – वकील की दलीलें
वकील एपी सिंह ने केस के कमजोर पड़ने के चार प्रमुख कारण गिनाए:

  1. सीधे सुप्रीम कोर्ट जाना:
    शिकायतकर्ता पहलवानों ने थाने, राज्य सरकार या महिला आयोग से संपर्क करने की बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने भी सवाल उठाया कि क्या किसी अन्य माध्यम से शिकायत की गई थी?
  2. प्रायोजित धरना:
    वकील ने कहा कि जंतर-मंतर पर दिया गया धरना पूरी तरह से राजनीतिक था। वहां चादर, गद्दा, मच्छरदानी से लेकर हलवाई तक की व्यवस्था पहले से थी। यह आंदोलन नहीं, एक पूर्व-नियोजित मंच था।
  3. गवाहों की कमी:
    चार्जशीट में 108 लोगों के बयान थे, लेकिन सिर्फ 15 ने पहलवानों के पक्ष में गवाही दी। न कोई प्रत्यक्षदर्शी था, न घटनाओं की पुष्टि करने वाले स्वतंत्र साक्ष्य।
  4. जाली दस्तावेज:
    पॉक्सो एक्ट की धारा इसी आधार पर लागू की गई कि पीड़िता नाबालिग थी। लेकिन बचाव पक्ष ने असली जन्म प्रमाणपत्र पेश कर यह साबित कर दिया कि वह घटना के समय बालिग थी। नकली दस्तावेज देने का आरोप लगाया गया।

अब क्या?
वकील एपी सिंह ने विश्वास जताया है कि दूसरा केस, जिसमें सिर्फ छेड़छाड़ के आरोप हैं, वह भी अदालत में नहीं टिक पाएगा। उन्होंने इसे पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और संस्था को बदनाम करने की कोशिश करार दिया।

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