YC न्यूज़ डेस्क । देश की आर्थिक प्रगति और विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने व्यवस्था की संवेदनहीनता और गरीबों की मजबूरी को उजागर कर दिया है। मामला एक आदिवासी युवक जीतू मुंडा से जुड़ा है, जिसे अपनी दिवंगत बहन कालरा मुंडा के बैंक खाते से महज 19,300 रुपये निकालने थे। बताया जा रहा है कि जब जीतू बैंक पहुंचा, तो अधिकारियों ने उसे साफ तौर पर कह दिया कि पैसे तभी मिलेंगे जब खाताधारक खुद उपस्थित हो या फिर डेथ सर्टिफिकेट और कानूनी वारिस का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया जाए। आर्थिक तंगी और जरूरी दस्तावेजों के अभाव में जूझ रहे जीतू के पास कोई विकल्प नहीं बचा।
व्यवस्था की इसी कठोरता और अपनी लाचारी के बीच उसने एक ऐसा कदम उठाया, जिसे सुनकर हर कोई सन्न रह गया। जीतू ने अपनी बहन की कब्र खोदी, उसके कंकाल को बोरी में भरा और करीब 5 किलोमीटर तक कंधे पर ढोकर बैंक पहुंच गया, ताकि यह साबित कर सके कि उसकी बहन अब इस दुनिया में नहीं है। इस घटना ने न केवल बैंकिंग सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि देश के दूरदराज इलाकों में रहने वाले गरीब और आदिवासी आज भी बुनियादी अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए प्रशासन से मांग की है कि ऐसे मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए और जरूरतमंदों को नियमों के जाल में उलझाने के बजाय राहत पहुंचाई जाए।
यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है—क्या विकास के दावों के बीच हम सबसे कमजोर वर्ग की संवेदनाओं और जरूरतों को कहीं पीछे तो नहीं छोड़ रहे?