
रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने उपभोक्ताओं के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज कर दी है। आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि बीमारी का पता चलने के बाद 28 दिन तक जीवित रहने की शर्त उपभोक्ताओं के अधिकारों के खिलाफ है और इसे अनुचित अनुबंध माना जाएगा। राज्य आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गौतम चौरड़िया और सदस्य प्रमोद कुमार वर्मा की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ऐसी शर्त बीमा अनुबंध के मूल उद्देश्य के विपरीत है। आयोग ने कहा कि यदि गंभीर बीमारी का निदान होने के 28 दिन के भीतर बीमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और केवल इसी आधार पर दावा खारिज कर दिया जाए, तो बीमा सुरक्षा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
10 लाख के बीमा दावे का मामला
मामला अनीता सिंह और एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड सहित अन्य पक्षों के बीच का है। शिकायतकर्ता अनीता सिंह ने जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा में शिकायत दर्ज कराते हुए बताया था कि उनके पति अभय राज सिंह की मृत्यु के बाद समूह बीमा योजना के तहत लगभग 10 लाख रुपये के बीमा दावे को कंपनी ने अस्वीकार कर दिया। बीमा कंपनी ने यह कहते हुए दावा खारिज किया था कि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार बीमारी के निदान के बाद बीमित व्यक्ति को कम से कम 28 दिन तक जीवित रहना आवश्यक था, जबकि अभय राज सिंह की मृत्यु इससे पहले हो गई थी।
बैंक खाते पर रोक लगाने का भी आरोप
शिकायत में यह भी कहा गया कि संबंधित बैंक शाखा ने बिना पूर्व सूचना और पर्याप्त कारण बताए शिकायतकर्ता के बचत खाते पर रोक लगा दी थी। इसके कारण वे खाते में जमा राशि और हर महीने मिलने वाली पेंशन का उपयोग नहीं कर सकीं। शिकायतकर्ता ने इसे बैंक की लापरवाही और सेवा में गंभीर कमी बताया।
बैंक और बीमा कंपनी की दलीलें
सुनवाई के दौरान बैंक ने आयोग के समक्ष दावा किया कि शिकायतकर्ता का खाता कभी फ्रीज नहीं किया गया और लगाए गए आरोप निराधार हैं। दूसरी ओर, एसबीआई जनरल इंश्योरेंस ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बीमा अनुबंध की शर्तें दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होती हैं और 28 दिन जीवित रहने की शर्त पॉलिसी का वैध हिस्सा है।
आयोग ने बताया अनुचित और अन्यायपूर्ण
राज्य उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि ऐसी शर्त उपभोक्ता पर अनुचित और हानिकारक दायित्व डालती है, इसलिए इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 48 के तहत अनुचित अनुबंध माना जाएगा। आयोग ने यह भी माना कि बीमा कंपनी द्वारा दावा अस्वीकार करना उचित नहीं था। साथ ही, बैंक द्वारा बिना पर्याप्त कारण और सूचना के खाते पर रोक लगाना भी सेवा में कमी और लापरवाही की श्रेणी में आता है।
जिला आयोग का आदेश बरकरार
राज्य आयोग ने जिला उपभोक्ता आयोग, कोरबा के आदेश को सही ठहराते हुए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी। आयोग ने उपभोक्ता हितों की रक्षा करते हुए कंपनी पर लगाए गए दंडात्मक प्रावधानों को भी बरकरार रखा। इस फैसले को उपभोक्ता अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे उन बीमा धारकों को राहत मिलने की उम्मीद है जिनके दावे तकनीकी और कठोर शर्तों के आधार पर अस्वीकार किए जाते रहे हैं।