DRG…बस्तर की कोख से निकली वह शक्ति जिसने गिराया माओवाद का किला,एसपी प्रभात कुमार ने इसे बस्तर की आत्मा बताया…

नारायणपुर (स्पेशल रिपोर्ट ) बस्तर की धरती से जन्मी जिला रिजर्व गार्ड (DRG) की बहादुर टुकड़ी ने नक्सल इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय लिखा है। बीते 21 मई को अबूझमाड़ के घने जंगलों में हुई मुठभेड़ में DRG के जांबाज़ जवानों ने माओवादी महासचिव बसवराजू उर्फ नंबाला केशव राव को मार गिराया। यह वही बसवराजू था, जिसे माओवादियों का सर्वोच्च रणनीतिकार माना जाता था और जिसकी तलाश में वर्षों से कई राज्य एकजुट प्रयास कर रहे थे।

इस ऐतिहासिक ऑपरेशन की जानकारी देते हुए नारायणपुर के पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार ने प्रेस को संबोधित किया और DRG के शौर्य को सलाम किया। उन्होंने कहा, यह मुठभेड़ केवल एक एनकाउंटर नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। अबूझमाड़, जिसे नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था, अब हमारी सुरक्षा बलों की रणनीति के आगे बौना साबित हुआ है। प्रभात कुमार द्वारा जारी एक वीडियो फुटेज में DRG के जवानों को घने जंगलों के बीच नदियाँ पार करते और दुर्गम पहाड़ियों में चढ़ाई करते हुए देखा जा सकता है।


बस्तर की आत्मा है DRG, न कि केवल बल

एसपी प्रभात कुमार ने बताया कि DRG महज एक ‘एंटी नक्सल फोर्स’ नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा का प्रतिनिधित्व करने वाला बल है। DRG के 40% से अधिक जवान स्थानीय युवा हैं, जिनकी भर्ती 2022 के बाद हुई। इनमें 20% महिलाएं हैं, जो अब बंदूक थामे जंगल की वीरांगनाएं बन गई हैं। 15-20% जवान पूर्व नक्सली हैं, जिन्होंने हथियार छोड़ लोकतंत्र का रास्ता अपनाया।

इन जवानों ने बंदूक नहीं, संविधान को चुना है। DRG अब बस्तर की चेतना बन गई है, जो खुद अपनी रक्षा कर रही है।” — प्रभात कुमार


तकनीक और बुद्धिमत्ता का संगम है DRG

DRG को अब सिर्फ बंदूक चलाने वाली फोर्स समझना भूल होगी। प्रभात कुमार ने बताया कि ये जवान Google Earth, GIS मैपिंग, संचार विश्लेषण और गेम थ्योरी जैसे आधुनिक तरीकों का उपयोग कर नक्सलियों की चालें पढ़ते हैं। जहां पहले माओवादी सुरक्षाबलों की रणनीति समझ लेते थे, आज DRG उनकी दो चालें पहले भांप लेती है।”


अब माओवादियों में है डर, और वो डर है DRG का

बसवराजू की मौत ने माओवादी नेटवर्क की कमर तोड़ दी है। अबूझमाड़, जो कभी उनका गढ़ हुआ करता था, अब सुरक्षा बलों की निर्णायक कार्रवाई का प्रतीक बन गया है। एसपी ने कहा,पहले बस्तर के लोग नक्सलियों से डरते थे, आज नक्सली DRG से कांपते हैं।”


इस ऑपरेशन ने न केवल माओवाद विरोधी अभियान को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है, बल्कि DRG को वह सम्मान दिलाया है, जिसकी वह हकदार थी। यह बल अब बस्तर की मिट्टी से उपजी वह चेतना है, जो अंधेरे को चीरते हुए उम्मीद की लौ बन चुकी है।

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