
रायपुर। देशभर में E-20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल के उपयोग को बढ़ावा दिए जाने के बीच रायपुर में एक कार के इंजन खराब होने का मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और उसके अधिकृत डीलर को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए ग्राहक को 45 दिनों के भीतर E-20 अनुकूल नई कार देने अथवा करीब 20.5 लाख रुपये सहित अन्य खर्च वापस करने का आदेश दिया है। कंपनी ने इस फैसले को तथ्यों के विपरीत बताते हुए उच्च मंच पर चुनौती देने की घोषणा की है। यह मामला रायपुर निवासी डॉ. प्रेमराज देबता से जुड़ा है, जिन्होंने जून 2024 में नेक्सा डीलरशिप से ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस खरीदी थी। डॉ. देबता का आरोप है कि खरीद के समय उन्हें वाहन की निर्माण तिथि दिसंबर 2023 बताई गई, जबकि बाद में रिकॉर्ड में यह जनवरी 2023 की बनी हुई पाई गई।
करीब पांच महीने बाद, नवंबर 2024 में कार चलाते समय डैशबोर्ड पर इंजन खराबी का अलर्ट आया और वाहन बीच रास्ते में बंद हो गया। जांच के दौरान डीलर ने इसे मिलावटी पेट्रोल का मामला बताया और फ्यूल टैंक की सफाई कराई। हालांकि, इसके बाद भी वाहन कई बार खराब होता रहा और पीड़ित को पांच बार कार सर्विस सेंटर ले जानी पड़ी। कंपनी की जांच में फ्यूल टैंक, पाइपलाइन और फिल्टर में सफेद परत जैसी सामग्री मिलने की बात सामने आई। बाद में कंपनी ने ई-मेल के माध्यम से इंजन पूरी तरह खराब होने की जानकारी देते हुए इंजन बदलने के लिए करीब 5.30 लाख रुपये का खर्च बताया, जिसे वारंटी के दायरे से बाहर बताया गया। मरम्मत के बाद भी वाहन कुछ किलोमीटर चलने के बाद दोबारा बंद हो गया।
मामले की जांच के लिए पेट्रोल के नमूनों की सरकारी लैब में जांच कराई गई। रिपोर्ट में ईंधन में एथेनॉल की मौजूदगी की पुष्टि हुई, लेकिन यह भी सामने आया कि एथेनॉल अलग होकर नीचे सफेद परत के रूप में जमा हो गया था। आयोग ने माना कि वाहन का इंजन E-20 ईंधन के अनुरूप नहीं था, जबकि ग्राहक को ऐसा वाहन बेचा गया। 14 जुलाई 2026 को सुनाए गए आदेश में आयोग ने कहा कि यदि कंपनी 45 दिनों के भीतर ग्राहक को उसी मॉडल की E-20 अनुकूल नई कार उपलब्ध नहीं कराती है, तो उसे वाहन की कीमत लगभग 20.5 लाख रुपये, आरटीओ पंजीकरण शुल्क, बीमा सहित सभी खर्च लौटाने होंगे। साथ ही मानसिक प्रताड़ना के लिए 1 लाख रुपये और वाद व्यय के रूप में 10 हजार रुपये देने के निर्देश भी दिए गए हैं।
इस फैसले के बाद मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड ने स्पष्ट किया है कि संबंधित वाहन पहले से ही E-20 ईंधन के उपयोग के लिए उपयुक्त था। कंपनी का कहना है कि उपभोक्ता आयोग के आदेश में तथ्यों का सही उल्लेख नहीं किया गया है और वह इस निर्णय को उच्च न्यायिक मंच पर चुनौती देगी। ऑटो विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एथेनॉल और पेट्रोल का मिश्रण समान रूप से न हो या उसमें नमी आ जाए तो ईंधन अलग-अलग परतों में विभाजित हो सकता है, जिससे फ्यूल सिस्टम और इंजन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। यह मामला E-20 ईंधन के उपयोग, वाहन की तकनीकी अनुकूलता और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर देश में सामने आया पहला बड़ा कानूनी फैसला माना जा रहा है, जिस पर अब ऑटोमोबाइल उद्योग और उपभोक्ताओं की नजरें टिकी हुई हैं।