रायपुर। छत्तीसगढ़ के कोंडागांव स्थित बालगृह की तीन बेटियों ने कठिन हालातों को पीछे छोड़ते हुए खेलों के दम पर अपनी अलग पहचान बना ली है। रंजीता, रवीना और ममता आज नेशनल स्तर की खिलाड़ी बन चुकी हैं और देश-प्रदेश का नाम रोशन कर रही हैं। इन बेटियों की सफलता संघर्ष, हौसले और आत्मविश्वास की मिसाल बन गई है। इन तीनों खिलाड़ियों की कहानी दर्द और संघर्ष से भरी रही है। किसी ने पिता को खो दिया तो किसी को परिवार ने छोड़ दिया। लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी और खेल को ही अपनी जिंदगी का सहारा बना लिया। आज यही खेल उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा रहा है।
18 वर्षीय रंजीता ने अब तक 11 नेशनल और इंटरनेशनल मुकाबलों में हिस्सा लिया है। बचपन में पिता के निधन के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और उन्हें नानी के घर छोड़ दिया गया। वहीं से बालगृह पहुंचीं रंजीता ने जूडो में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने खेलो इंडिया प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ को पहला गोल्ड मेडल दिलाकर इतिहास रचा। वर्तमान में वह भारतीय खेल प्राधिकरण के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में प्रशिक्षण ले रही हैं।
14 साल की रवीना जब 9 साल की उम्र में बालगृह आई थीं, तब वह डरी-सहमी रहती थीं और किसी से बात नहीं करती थीं। घर पर घरेलू काम करने वाली रवीना ने बालगृह में तीरंदाजी सीखी और अब खेलो इंडिया स्टेट सेंटर बिलासपुर के लिए चयनित हुई हैं।
ममता की कहानी भी बेहद मार्मिक है। बचपन में ही पिता का साया उठ गया और मां से भी साथ छूट गया। जब वह बालगृह पहुंचीं, तब उन्हें अपने पिता का नाम तक याद नहीं था। बालगृह ने ही उन्हें शिक्षा और खेल की राह दिखाई। उन्होंने जूडो में प्रशिक्षण लेकर अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और आईटीबीपी के प्रशिक्षण केंद्र से भी जुड़ी हैं।
बालिका गृह की अधीक्षिका मणि शर्मा बताती हैं कि बस्तर क्षेत्र में इस तरह की समस्याएं आम हैं, जहां पारिवारिक परिस्थितियों के कारण बच्चों को छोड़ दिया जाता है। ऐसे में बालगृह ही इन बच्चों का परिवार बनता है और उन्हें नई दिशा देता है। आज ये तीनों बेटियां यह साबित कर रही हैं कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो तो सफलता जरूर मिलती है। छत्तीसगढ़ की ये बेटियां न केवल खेल के मैदान में जीत रही हैं, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं।