चर्च-मस्जिद की संपत्तियों पर नियंत्रण का डर, FCRA संशोधन विधेयक पर देश-विदेश में बढ़ा विवाद ! सरकार के पास संख्या बल मजबूत, लेकिन राजनीतिक दुविधा बरकरार

चर्च-मस्जिद की संपत्तियों पर नियंत्रण का डर, FCRA संशोधन विधेयक पर देश-विदेश में बढ़ा विवाद ! सरकार के पास संख्या बल मजबूत, लेकिन राजनीतिक दुविधा बरकरार

विदेशी चंदे से जुड़ी संस्थाओं पर सख्ती की तैयारी, विपक्ष और ईसाई संगठनों ने जताई चिंता

YC न्यूज़ डेस्क । विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। सरकार विदेशी चंदे के उपयोग और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सख्त प्रावधान लागू करने की तैयारी में है। हालांकि विपक्षी दलों, ईसाई संगठनों और कुछ अंतरराष्ट्रीय आवाजों ने इसे धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं पर बढ़ते सरकारी नियंत्रण के रूप में पेश किया है। रिपोर्टों के अनुसार, संसद में इस विधेयक पर 12 अगस्त को चर्चा हो सकती है और इसका जवाब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह दे सकते हैं।


क्या है FCRA और क्यों हो रहा है संशोधन

FCRA कानून पहली बार 1976 में लागू किया गया था, ताकि विदेशी ताकतें एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता देकर भारत की आंतरिक नीतियों को प्रभावित न कर सकें। 2010 और 2020 में भी इसमें कई सख्त संशोधन किए गए थे।

2026 में सरकार ने तीन प्रमुख बदलाव प्रस्तावित किए हैं—

  • विदेशी चंदे का उपयोग किस विशेष कार्य और किस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में होगा, इसका स्पष्ट उल्लेख करना होगा।
  • विदेशी फंड का उपयोग धर्म परिवर्तन के लिए नहीं किया जा सकेगा।
  • किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त, रद्द या निरस्त होने पर विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के रखरखाव और प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण के पास होगी।

सरकार का कहना है कि यह प्रावधान उन स्थितियों में कानूनी स्पष्टता लाने के लिए है, जब किसी संस्था का पंजीकरण समाप्त हो जाता है और उसकी संपत्तियों तथा शेष धनराशि के प्रबंधन को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं होती।


चर्च और एनजीओ क्यों जता रहे हैं चिंता

कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) ने गृह मंत्री को पत्र लिखकर आशंका जताई है कि छोटी प्रशासनिक त्रुटियों या दस्तावेजी गलतियों के कारण लाइसेंस रद्द होने और संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का खतरा पैदा हो सकता है। ईसाई संगठनों का कहना है कि दशकों में स्कूल, अस्पताल, आश्रम और सामाजिक सेवा संस्थान विदेशी सहायता से विकसित हुए हैं। यदि पंजीकरण नवीनीकरण में देरी या तकनीकी कारणों से समस्या आती है, तो पूरा ढांचा प्रभावित हो सकता है। ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के प्रतिनिधियों ने इसे ईसाई संस्थाओं के खिलाफ कठोर कदम बताया है, जबकि कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया है कि इसका असर अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित सामाजिक संस्थाओं पर अधिक पड़ेगा।


अमेरिका तक पहुंचा मामला

विधेयक को लेकर अमेरिकी सांसद रिले मूर ने भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि ऐसे कदम भारत-अमेरिका संबंधों में चर्चा का विषय बन सकते हैं। हालांकि भारत सरकार की ओर से अब तक इसे पूरी तरह आंतरिक और कानूनी सुधार का मामला बताया गया है।


सरकार का पक्ष

गृह मंत्री अमित शाह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रस्तावित संशोधन किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि ये प्रावधान पुराने मामलों पर लागू नहीं होंगे और केवल भविष्य की स्थितियों के लिए होंगे। सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग से जुड़े मामलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।


संसद में क्या है स्थिति

FCRA संशोधन एक सामान्य विधेयक है, जिसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।

  • लोकसभा में एनडीए के पास लगभग 318 सांसद हैं।
  • राज्यसभा में एनडीए के पास लगभग 152 सदस्य हैं।

इस लिहाज से सरकार के पास विधेयक पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है।


फिर दुविधा क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार असली चुनौती संख्या नहीं, बल्कि राजनीतिक समय और सहयोगी दलों का संतुलन है। सरकार आने वाले समय में परिसीमन से जुड़े बड़े संवैधानिक विधेयक पर भी व्यापक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। ऐसी स्थिति में कुछ क्षेत्रीय दल, जिनके ईसाई या मुस्लिम वोट बैंक पर प्रभाव पड़ सकता है, FCRA संशोधन का समर्थन करने से बच सकते हैं। यदि सरकार उनकी सहमति के बिना यह विधेयक पारित कराती है, तो भविष्य के बड़े विधायी एजेंडों पर सहयोग प्रभावित हो सकता है।


देशभर में बढ़ी बहस

फिलहाल देश में लगभग 16 हजार FCRA पंजीकृत संस्थाएं सक्रिय हैं और उन्हें हर साल हजारों करोड़ रुपये की विदेशी सहायता प्राप्त होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा इस फंडिंग पर निर्भर माना जाता है। इसी वजह से यह विवाद केवल कानूनी संशोधन तक सीमित नहीं रह गया है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता का आवश्यक कदम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर संभावित हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है। अब निगाहें संसद की संभावित चर्चा और सरकार की अंतिम रणनीति पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि FCRA संशोधन विधेयक राजनीतिक सहमति के साथ आगे बढ़ेगा या विवाद और गहराएगा।

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