रायपुर। दीपावली की रात जब पूरा प्रदेश रोशनी और खुशियों में डूबा था, उसी समय रायपुर के डीकेएस अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में जीवन और दृष्टि बचाने की जंग चल रही थी। बिलासपुर की 9 वर्षीय काव्या खेलने के दौरान घंटी पर मुंह के बल गिर गई, और घंटी का नुकीला सिरा उसकी बाईं आंख से होते हुए सीधे दिमाग में धंस गया। हादसा इतना गंभीर था कि यह मामला डॉक्टरों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं था। सिम्स, बिलासपुर में प्राथमिक उपचार के बाद बच्ची को तुरंत डीकेएस अस्पताल, रायपुर रेफर किया गया। सीटी स्कैन रिपोर्ट में पता चला कि घंटी का हैंडल ऑर्बिट (आंख की हड्डी) को पार कर ब्रेन टिश्यू तक जा पहुंचा था। ऐसे मामलों में जरा सी चूक भी दिमागी रक्तस्राव, लकवा या दृष्टिहीनता का कारण बन सकती थी।
टीम ने 11 घंटे में की तैयारी, 4 घंटे चली सर्जरी
दिवाली की रात अधिकतर डॉक्टर छुट्टी पर थे, लेकिन स्थिति की गंभीरता समझते हुए डॉ. शिप्रा और उप अधीक्षक डॉ. हेमंत शर्मा ने तुरंत सर्जन टीम को बुलाया। न्यूरोसर्जन डॉ. नमन चंद्राकर और डॉ. देवश्री की सहायता से टीम का नेतृत्व दो विशेषज्ञ डॉक्टरों ने किया, जबकि डॉ. प्रांजल मिश्रा ने आंख की सर्जरी का महत्वपूर्ण हिस्सा संभाला।
टीम ने निर्णय लिया कि सर्जरी एंडोस्कोपिक (दूरबीन तकनीक) से की जाएगी, ताकि दिमाग को न्यूनतम नुकसान पहुंचे। भौंह के ऊपर (सुप्राऑर्बिटल) हिस्से में छोटा चीरा लगाकर घंटी के नुकीले हिस्से को आंख के रास्ते सावधानीपूर्वक अलग किया गया। लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर भीतर धंसे उस टुकड़े को धीरे-धीरे बाहर निकाला गया। इसके बाद दिमाग की बाहरी परत (ड्यूरा) की रिपेयरिंग की गई।
◆ पोस्ट ऑपरेशन में लौटी रोशनी, मुस्कान भी
करीब चार घंटे की जटिल सर्जरी के बाद जब घंटी का हिस्सा सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया, तो ऑपरेशन थिएटर में मौजूद हर व्यक्ति ने राहत की सांस ली।
पोस्ट-ऑपरेशन जांच में सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि काव्या ने दोनों आंखों से साफ देखा और होश में आने के बाद मुस्कुराई। उसकी दिमागी कार्यप्रणाली भी पूरी तरह सामान्य थी।
◆ गंभीर खतरे टले
डॉक्टरों के अनुसार, इस स्थिति में ब्रेन हैमरेज, मिर्गी, पैरालिसिस और दृष्टिहीनता का खतरा था, परंतु घंटी इस तरह घुसी थी कि उसने महत्वपूर्ण नसों और रक्त वाहिकाओं को क्षति नहीं पहुंचाई। यह न केवल चिकित्सकीय दृष्टि से जटिल ऑपरेशन था, बल्कि भावनात्मक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण रहा।