15 साल में 30 लाख लोगों के 2000 करोड़ डूबे, लौटे सिर्फ 98 करोड़: चिटफंड पीड़ितों को राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी छत्तीसगढ़ सरकार

15 साल में 30 लाख लोगों के 2000 करोड़ डूबे, लौटे सिर्फ 98 करोड़: चिटफंड पीड़ितों को राहत दिलाने सुप्रीम कोर्ट जाएगी छत्तीसगढ़ सरकार

रायपुर। छत्तीसगढ़ में चिटफंड कंपनियों के जाल में फंसकर लाखों निवेशकों की खून-पसीने की कमाई डूबने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पिछले करीब 15 वर्षों में प्रदेश के 30 लाख से अधिक निवेशकों के 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा चिटफंड कंपनियों में फंस गए, लेकिन अब तक केवल 5.16 लाख निवेशकों को करीब 98 करोड़ रुपए ही वापस मिल पाए हैं। यानी कुल राशि का महज लगभग 5 प्रतिशत ही पीड़ितों तक पहुंच सका है। राशि वापसी की धीमी रफ्तार के पीछे सबसे बड़ी वजह चिटफंड कंपनियों की संपत्तियों की कुर्की और नीलामी की कानूनी प्रक्रिया का लंबा अटकना बताया जा रहा है। कई कंपनियों की 200 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की संपत्तियों पर जिला अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में स्टे आदेश होने के कारण उनकी बिक्री नहीं हो पा रही है। इसी वजह से पिछले दो वर्षों से निवेशकों को राशि लौटाने की प्रक्रिया लगभग ठप पड़ी हुई है।

अब इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका दायर करने की तैयारी कर रही है। सरकार की ओर से सभी लंबित मामलों में लगे स्टे हटाने और चिटफंड कंपनियों की संपत्तियों की नीलामी का रास्ता साफ करने की मांग की जाएगी, ताकि पीड़ित निवेशकों को जल्द राहत मिल सके। प्रदेश में करीब 15 वर्ष पहले हजारों छोटी-बड़ी चिटफंड कंपनियों ने ऊंचे मुनाफे का लालच देकर लोगों से निवेश कराया था। रायपुर जिले में ही 66 कंपनियों में 800 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश हुआ था, लेकिन अधिकांश कंपनियां रातों-रात फरार हो गईं। वर्ष 2018 में तत्कालीन सरकार ने नया कानून बनाकर निवेशकों की राशि लौटाने का दावा किया था, लेकिन अब तक सीमित सफलता ही मिल सकी है।

जानकारी के अनुसार राज्य में फिलहाल 220 से अधिक अनियमित चिटफंड कंपनियों के खिलाफ करीब 490 एफआईआर दर्ज हैं। इनमें 265 मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं, जबकि 80 कंपनियों के 66 से अधिक निदेशकों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में निवेशकों को अब तक उनकी जमा पूंजी वापस नहीं मिल पाई है। चिटफंड घोटाले से प्रभावित परिवारों की पीड़ा भी कम नहीं है। नवा रायपुर निवासी लक्ष्मीनारायण चंद्राकर ने बेटे के कारोबार के लिए जमा पूंजी निवेश की थी, जो डूबने के बाद उन्हें बैंक से ऋण लेना पड़ा। वहीं नरदहा निवासी कृष्णकांत साहू का मकान बनाने का सपना भी चिटफंड कंपनी बंद होने के कारण अधूरा रह गया और वे वर्षों से धीरे-धीरे निर्माण कार्य पूरा करा रहे हैं। प्रदेश में कई चिटफंड कंपनियों की करोड़ों रुपए की संपत्तियों की जानकारी प्रशासन के पास मौजूद है, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण कई संपत्तियों की कुर्की और नीलामी नहीं हो सकी है। अदालतों में लंबित मामलों और विभिन्न राज्यों में चल रही सुनवाई के चलते यह प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

चिटफंड मामलों के जानकार अधिवक्ताओं का मानना है कि यदि सभी मामलों की सुनवाई एक ही न्यायालय में होती है तो संपत्तियों की कुर्की और नीलामी की प्रक्रिया तेज हो सकती है तथा सरकार के खाते में राशि आने के बाद पात्र निवेशकों को सीधे भुगतान किया जा सकेगा। चिटफंड मामलों के नोडल अधिकारी एवं पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी दौलत राम पोर्ते ने बताया कि पुरानी एफआईआर के आधार पर कंपनियों की संपत्तियों की जानकारी राज्य सरकार को उपलब्ध करा दी गई है और जिन संपत्तियों पर न्यायालय का स्थगन आदेश है, उन्हें हटाने के लिए नियमानुसार आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट में पहल के बाद लाखों पीड़ित निवेशकों को राहत मिलने का रास्ता खुल सकेगा।

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