दुर्ग, 21 अप्रैल – छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के कंदरका गांव में स्थित एक 150 साल पुराना तालाब इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। ‘बड़ा तालाब’ के नाम से मशहूर यह जलाशय भीषण गर्मियों में भी कभी नहीं सूखा और आज भी आसपास के छह गांवों के लिए पानी का एक भरोसेमंद स्रोत बना हुआ है।
दुर्ग शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में वर्षों पहले जमींदार गुरमिन गौटिया ने अपनी पत्नी के सम्मान और जरूरत के लिए इस तालाब का निर्माण करवाया था। स्थानीय निवासी जीवन लाल ने बताया कि उस दौर में पानी की भारी कमी थी और गौटिया की पत्नी को नहाने के लिए 2 किलोमीटर दूर पैदल जाना पड़ता था। एक दिन जब गांव की कुछ महिलाओं ने इस पर तंज कसा, तो वह अपमानित होकर वापस लौट आईं और तब तक स्नान न करने का प्रण लिया जब तक गांव में खुद का तालाब न बने।
इस प्रण से प्रेरित होकर जमींदार ने तालाब बनाने की योजना बनाई। उन्होंने गांव के कुछ लापता मवेशियों के शरीर पर लगे गीली मिट्टी और घास से उस स्थान का अंदाजा लगाया जहां भूमिगत जलस्रोत मौजूद हो सकता था। उस स्थान की खुदाई शुरू हुई और कुछ ही समय में पानी का छोटा स्रोत मिल गया। इसके बाद, करीब 100 मजदूरों की मदद से पांच महीनों में तालाब खोदा गया।
तब से लेकर आज तक यह तालाब न सिर्फ गांव के लोगों की पीने के पानी की जरूरत पूरी करता है, बल्कि खेतों की सिंचाई में भी अहम भूमिका निभाता है।
स्थानीय निवासी नरोत्तम पाल ने बताया कि गांववाले इस तालाब की वर्षों से देखरेख कर रहे हैं और इसके चारों ओर अतिक्रमण नहीं होने दिया है।
दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल ने पीटीआई से कहा कि यह तालाब क्षेत्र की विरासत है और इसके संरक्षण व पुनर्जीवन के लिए विशेष योजना बनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि ऐसे जलस्रोत जैव विविधता और भूजल स्तर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।