दुर्ग-छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपरा और विलुप्त होती लोकवाद्य कला को संजोने की दिशा में एक अभूतपूर्व पहल करते हुए कुहूकी कला ग्राम संग्रहालय, मरोदा सेक्टर में आयोजित 10 दिवसीय लोकवाद्य कार्यशाला का समापन गरिमामय माहौल में हुआ। इस आयोजन में दुर्ग ग्रामीण विधायक ललित चंद्राकर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
समारोह में विधायक चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ की 210 पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों का अवलोकन किया और इस अनूठे संग्रह के लिए कलाकार रिखी क्षत्रिय और अन्नपूर्णा क्षत्रिय की प्रशंसा करते हुए उन्हें लोकधरोहर का संरक्षक बताया। उन्होंने कहा, “रिखी क्षत्रिय आधुनिकता के दौर में छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी विरासत को संजोने का जो काम कर रहे हैं, वह अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायी है।”
“लोकवाद्य केवल यंत्र नहीं, हमारी आत्मा हैं”
विधायक ने कहा कि लोकवाद्य केवल वाद्ययंत्र नहीं हैं, ये छत्तीसगढ़ की आत्मा, परंपरा और संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं। रिखी क्षत्रिय ने हाल ही में नारायणपुर से एक दुर्लभ बड़ा ढोल लाकर संग्रहालय में शामिल किया है, जो इस कला को जीवित रखने की उनकी गंभीर निष्ठा को दर्शाता है।
कला साधकों को सम्मान
समारोह में विभिन्न क्षेत्रों से आए लोककला अभ्यर्थियों को शाल और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। विधायक ने उन्हें शुभकामनाएं दीं और कहा कि “आज जब आधुनिकता की आंधी में लोककलाएं लुप्त हो रही हैं, ऐसे में इन कलाकारों का प्रयास प्रेरणास्रोत है।”
गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में सेफी चेयरमैन व ओए अध्यक्ष नरेंद्र बंछोर, रिसाली निगम सभापति केशव बंछोर, साहित्यकार परदेसीराम वर्मा, मंडल अध्यक्ष राजू जंघेल, एमआईसी सदस्य सनीर साहू सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
पारंपरिक ध्वनि को दी नई पहचान
कार्यशाला में लोकवाद्यों की परंपरा, निर्माण प्रक्रिया और उनके प्रयोग पर आधारित व्यावहारिक सत्र आयोजित किए गए, जिससे युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका मिला। संग्रहालय परिसर में लोकवाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी भी लगी रही, जिसे लोगों ने बड़े उत्साह से देखा।