“मां मजदूरी कर पढ़ा रही, पास करा दो”: कॉपियों में छलका छात्रों का दर्द, परीक्षक बोले—अंक केवल उत्तरों पर

भिलाई। बोर्ड परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के दौरान इस बार परीक्षकों को केवल सवालों के जवाब ही नहीं, बल्कि छात्रों की भावनाएं भी पढ़ने को मिल रही हैं। कई कॉपियों में छात्र-छात्राओं ने अपनी आर्थिक स्थिति, पारिवारिक परेशानियों और भविष्य की चिंता का जिक्र करते हुए परीक्षकों से पास कराने की भावनात्मक अपील की है। जिले में इन दिनों दो केंद्रों—शासकीय आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम विद्यालय, दीपक नगर दुर्ग और शासकीय आदर्श गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल दुर्ग—में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन जारी है। दीपक नगर केंद्र में लगभग 42 हजार और गर्ल्स स्कूल केंद्र में करीब 52 हजार कॉपियां जांची जानी हैं। जानकारी के अनुसार, दीपक नगर में कक्षा 10वीं की 29,273 में से करीब 16 हजार कॉपियों की जांच पूरी हो चुकी है, जबकि 12वीं की 11,724 उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन अंतिम चरण में है।

कॉपियों में लिखी मार्मिक अपील
मूल्यांकन से जुड़े शिक्षकों के अनुसार, कई उत्तर पुस्तिकाओं में छात्रों ने अपनी स्थिति बताते हुए पास करने की गुहार लगाई है। एक छात्र ने लिखा कि वह बेहद गरीब परिवार से है और यदि इस बार पास नहीं हुआ तो पढ़ाई छोड़नी पड़ जाएगी। वहीं, 12वीं की एक छात्रा ने अपनी कॉपी में लिखा कि उसके पिता की कोरोना काल में मृत्यु हो गई और उसकी मां मजदूरी कर उसे पढ़ा रही हैं, इसलिए उसे पास कर दिया जाए। एक अन्य छात्रा ने सीधे तौर पर 27 अंक देकर पास करने की मांग लिख दी।

परीक्षकों का स्पष्ट रुख
शिक्षकों का कहना है कि छात्रों की परिस्थितियां संवेदनशील जरूर हैं, लेकिन मूल्यांकन पूरी तरह उत्तरों की गुणवत्ता के आधार पर ही किया जाता है। सहानुभूति के बावजूद नियमों से समझौता संभव नहीं है।

पहले भी दिखते थे ऐसे मामले
परीक्षकों ने बताया कि पहले के वर्षों में कॉपियों में शायरी, फिल्मी संवाद या भावनात्मक संदेश लिखने का चलन अधिक था। कुछ मामलों में छात्र उत्तर पुस्तिका में पैसे तक रख देते थे। हालांकि अब ऐसे मामले काफी कम हो गए हैं, फिर भी इक्का-दुक्का कॉपियों में इस तरह की अपील देखने को मिल रही है। केंद्र प्रभारियों ने कहा कि उनके स्तर पर ऐसे मामले सामने नहीं आए हैं, लेकिन कुछ परीक्षकों ने कॉपियों में भावनात्मक संदेश मिलने की जानकारी दी है। इस बीच शिक्षा जगत में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि छात्रों की यह गुहार उनकी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को भी उजागर करती है, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है।

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