कोलकाता।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की ‘मंदिर पॉलिटिक्स’ चर्चा में है। पिछले एक वर्ष के भीतर राज्य में तीन बड़े मंदिर परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया गया है। इसे लेकर राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है कि क्या इससे चुनावी समीकरण बदलेंगे या नहीं। 16 जनवरी 2026 को ममता बनर्जी ने सिलीगुड़ी में 17 एकड़ में बनने वाले महाकाल महातीर्थ मंदिर का शिलान्यास किया। इससे पहले दिसंबर 2025 में कोलकाता में दुर्गा आंगन परियोजना की आधारशिला रखी गई थी, जबकि करीब छह महीने पहले दीघा में पुरी की तर्ज पर बने Jagannath Dham Temple Digha में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किया गया था। राज्य सरकार का दावा है कि इन परियोजनाओं से पर्यटन और स्थानीय कारोबार को बढ़ावा मिला है। सरकारी सूत्रों के अनुसार दीघा में बने जगन्नाथ धाम मंदिर से पर्यटन गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है और स्थानीय व्यवसाय को भी लाभ मिला है। सरकार का कहना है कि इससे लगभग 100 करोड़ रुपए का आर्थिक फायदा हुआ है।
स्थानीय लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
दीघा में मंदिर के बाहर सामान बेचने वाली महिलाओं का कहना है कि मंदिर बनने से उन्हें रोजगार के अवसर मिले हैं। सुमित्रा नाम की महिला बताती हैं कि मंदिर आने वाले पर्यटकों के कारण उनकी बिक्री बढ़ी है और रोजाना की आय भी बेहतर हुई है। हालांकि कुछ स्थानीय लोगों की राय अलग है। संजय शर्मा नाम के निवासी कहते हैं कि राज्य में रोजगार की समस्या गंभीर है और मंदिर-मस्जिद की राजनीति से आम लोगों की समस्याएं हल नहीं होंगी। उनके अनुसार लोगों को रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और विकास की जरूरत है।
सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह पहल उनकी छवि को संतुलित करने की कोशिश हो सकती है। वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेगर के अनुसार ममता बनर्जी पर लंबे समय से मुस्लिम समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं, इसलिए हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की रणनीति अपनाई जा रही है। राजनीतिक विशेषज्ञ प्रभाकर मणि तिवारी का कहना है कि राज्य में अल्पसंख्यक वोट बैंक पर तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ है, लेकिन यदि हिंदू मतदाता पूरी तरह भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाते हैं तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे में मंदिर परियोजनाएं उसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।
BJP का आरोप—चुनावी तुष्टीकरण
भाजपा ने इन परियोजनाओं को चुनावी राजनीति करार दिया है। पार्टी के प्रवक्ताओं का कहना है कि सरकार को मंदिरों के बजाय स्कूल, अस्पताल और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। वहीं All India Trinamool Congress ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पार्टी धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करती। तृणमूल नेताओं का कहना है कि मंदिर परियोजनाएं पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई हैं।
चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गर्मी
राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल को प्रस्तावित हैं। ऐसे में मंदिर परियोजनाओं को लेकर शुरू हुई बहस ने बंगाल की राजनीति को और गरमा दिया है। हालांकि इन पहलों का चुनावी परिणामों पर कितना असर पड़ेगा, यह चुनाव नतीजों के बाद ही साफ हो सकेगा।