
मनीष चंद्राकर -संपादकीय
YC न्यूज़ डेस्क। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की आवाज़ होते हैं और अधिकारी शासन-प्रशासन की व्यवस्था के संवाहक। दोनों के बीच टकराव किसी भी स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता। लेकिन जब हालात ऐसे बन जाएं कि एक विधायक को सार्वजनिक रूप से किसी अधिकारी के व्यवहार पर नाराज़गी जतानी पड़े, तब सवाल केवल एक व्यक्ति या एक घटना का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के चरित्र पर खड़ा हो जाता है। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन्होंने यह बहस छेड़ दी है कि क्या कुछ अधिकारी-कर्मचारी खुद को जनप्रतिनिधियों और जनता दोनों से ऊपर समझने लगे हैं? सरगुजा से लेकर दुर्ग तक ऐसे विवाद चर्चा में हैं, जहां अधिकारियों की कथित मनमानी, निरंकुशता और जनप्रतिनिधियों के प्रति असहयोग की शिकायतें सामने आई हैं।
दुर्ग जनपद पंचायत के सीईओ से जुड़ा हालिया विवाद इसी बहस को और गहरा करता है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में भाजपा कार्यकर्ताओं और विधायक के सामने कथित अभद्र व्यवहार के आरोप लगाए गए। मामला यहीं तक सीमित रहता तो इसे प्रशासनिक अनुशासन का विषय माना जाता, लेकिन इसके बाद छत्तीसगढ़ के पत्रकार द्वारा वीडियो साझा किए जाने पर धमकी भरे संदेश सामने आने लगे। लोकतंत्र में आलोचना का जवाब तर्क से दिया जाता है, धमकी से नहीं। यदि किसी पत्रकार ने कोई वीडियो पोस्ट किया है और उसमें तथ्यात्मक गलती है, तो उसके लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं। लेकिन “साहब खूंखार हैं”, “उलझना मत”, “कुछ नहीं उखाड़ सकते” जैसी भाषा न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है, बल्कि यह उस मानसिकता को भी उजागर करती है जिसमें सत्ता का अहंकार संवाद पर भारी पड़ने लगता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर अधिकारी किसके लिए हैं? जनता के लिए, जनप्रतिनिधियों के लिए या फिर अपनी अलग सत्ता स्थापित करने के लिए? संविधान ने अधिकारियों को अधिकार दिए हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जोड़ी है। यदि कोई अधिकारी जनता और जनप्रतिनिधियों की बात सुनने को तैयार नहीं है, तो यह प्रशासनिक सेवा नहीं बल्कि प्रशासनिक अहंकार कहलाएगा।
दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों को भी यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं चुना, बल्कि कार्यकर्ताओं और आम लोगों के सम्मान की रक्षा के लिए भी चुना है। जो कार्यकर्ता धूप, बारिश और संघर्ष में किसी नेता के साथ खड़े रहते हैं, उनकी उपेक्षा राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी घातक साबित हो सकती है।
लोकतंत्र में न तो अधिकारी सर्वशक्तिमान हैं और न ही नेता। दोनों की ताकत जनता से आती है। इसलिए टकराव, धमकी और अहंकार की राजनीति छोड़कर जवाबदेही, संवाद और संवेदनशीलता की ओर लौटना ही बेहतर होगा।
वरना जिस व्यवस्था में पत्रकार सवाल पूछने से डरने लगें, कार्यकर्ता अपनी बात रखने से डरने लगें और जनप्रतिनिधि अपमानित महसूस करने लगें, वहां लोकतंत्र कमजोर होता है और निरंकुशता मजबूत।
अब भी संभलने का समय है बाकी तो नियति नटी की लीला न्यारी..