
मनीष चंद्राकर @जामगांव आर। जिले की सेवा सहकारी समितियों में धान के कथित “सुखत” (वजन में कमी) को लेकर समिति प्रबंधकों पर की जा रही कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। एक ओर प्रशासन लाखों रुपये की रिकवरी निकालकर समिति प्रबंधकों पर एफआईआर और दंडात्मक कार्रवाई कर रहा है, वहीं दूसरी ओर धान उठाव में हुई महीनों की देरी और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी पर कोई कार्रवाई नहीं होने से सहकारिता क्षेत्र में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इसी कड़ी में बीते दिनों पाटन ब्लॉक की कुम्हली सेवा सहकारी समिति में धान और बारदाने की कमी के नाम पर करीब 23.54 लाख रुपये की रिकवरी निकाली गई और समिति प्रबंधक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई। हालांकि हाल ही में इस मामले में हाईकोर्ट ने ऐसी परिस्थितियों को प्रथम दृष्टया जांच का विषय बताते हुए एफआईआर निरस्त करने से इंकार किया, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि धान की कमी के पीछे प्राकृतिक और अपरिहार्य कारणों की जांच आवश्यक है।
जानकारी के अनुसार खरीफ विपणन वर्ष में नवंबर माह से धान खरीदी शुरू हुई थी, लेकिन कई उपार्जन केंद्रों और समितियों से महीनों तक धान का उठाव नहीं हो पाया। गर्मी के मौसम में खुले या सामान्य भंडारण में रखे धान में नमी कम होने से वजन घटना स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। सहकारी क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि कई मामलों में प्रति बोरा दो किलो या उससे अधिक तक सुखत दर्ज किया गया, जिसे सीधे आर्थिक नुकसान मानकर समितियों पर वसूली थोप दी गई।
• “उठाव में देरी शासन की, सजा समितियों को”
समिति प्रबंधकों और सहकारी क्षेत्र के जानकारों का तर्क है कि धान खरीदी, भंडारण और उठाव की पूरी प्रक्रिया में केवल समिति ही नहीं, बल्कि जिला विपणन अधिकारी (डीएमओ), खाद्य विभाग और अन्य एजेंसियां भी जिम्मेदार होती हैं। यदि समय पर धान का परिवहन और उठाव नहीं हो सका तो उसका दायित्व केवल सहकारी संस्थाओ,समिति प्रबंधकों पर डालना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
क्षेत्र के कई समिति प्रबंधकों का कहना है कि कानूनी कार्रवाई और वसूली के दबाव के कारण कई समितियों ने लाखों रुपये की राशि किसी तरह जमा कर दी, ताकि एफआईआर और प्रशासनिक कार्रवाई से बचा जा सके।
• सहकारिता की भावना पर चोट : प्रीतपाल बेलचंदन
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक दुर्ग के अध्यक्ष प्रीतपाल बेलचंदन ने पत्रकारों से बातचीत में इस पूरे मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी समिति की वास्तविक गलती है और नियमों के अनुसार कमी पाई गई है तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन धान की कमी और सुखत के लिए केवल समिति प्रबंधकों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि धान उठाव में विलंब के लिए डीएमओ और संबंधित विभाग भी उतने ही जिम्मेदार हैं। यदि जांच हो रही है तो सभी जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। बेलचंदन ने शासन से मांग की कि धान के लंबे समय तक भंडारण और मौसमजनित सुखत का वैज्ञानिक एवं वास्तविक मूल्यांकन कराते हुए स्वस्थ समीक्षा कर आगे की कार्यवाही तय करें । श्री बेलचंदन ने यह भी कहा कि जो विभाग इसके लिए केवल सहकारी संस्थाओं को जिम्मेदार ठहरा रहे है उन्हें सचेत हो जाना चाहिए, ऐसे प्रयास का पुरजोर विरोध होगा।
• ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही नाराजगी-
मामले को लेकर सहकारी समितियों और किसानों के बीच भी चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि धान महीनों तक समितियों में पड़ा रहा और उसके उठाव की व्यवस्था समय पर नहीं हुई तो इसके लिए शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। केवल समिति प्रबंधकों पर रिकवरी और एफआईआर की कार्रवाई को कई लोग “एकतरफा” और “बलि का बकरा बनाने” जैसी कार्रवाई बता रहे हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब धान खरीदी से लेकर उठाव तक पूरी प्रक्रिया में कई विभाग शामिल हैं, तो फिर कार्रवाई का दायरा केवल समिति प्रबंधकों तक ही क्यों सीमित है? सहकारिता और कृषक जगत में यह मांग जोर पकड़ रही है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई की जाए, ताकि सहकारी संस्थाओं का मनोबल प्रभावित न हो और न्यायसंगत व्यवस्था कायम रह सके।