
संपादकीय -मनीष चंद्राकर /YC न्यूज़ डेस्क। भारतीय राजनीति में विचारों का संघर्ष नया नहीं है, लेकिन जब यह संघर्ष संतों और धर्माचार्यों के सम्मान तक पहुँच जाए, तब सवाल केवल राजनीति का नहीं बल्कि समाज की वैचारिक दिशा का भी बन जाता है। आज जिस तरह जगद्गुरु रामभद्राचार्य को भाजपा का प्रचारक बताकर उन पर टिप्पणी की जा रही है, वह कांग्रेस की उसी पुरानी मानसिकता को उजागर करता है जिसमें संतों का सम्मान भी राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौला जाता है। सवाल यह है कि क्या किसी संत का सम्मान इस आधार पर तय होगा कि वह किस दल के नेता के निकट दिखते हैं? यदि ऐसा है, तो कांग्रेस को पहले अपने राजनीतिक इतिहास की ओर भी देखना चाहिए। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती खुले रूप से कांग्रेस और विशेष रूप से इंदिरा गांधी के साथ खड़े दिखाई देते रहे। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं से उनके आत्मीय संबंध किसी से छिपे नहीं थे। तब कांग्रेस ने कभी यह नहीं कहा कि संत राजनीति कर रहे हैं या किसी दल के एजेंट बन गए हैं।
इतना ही नहीं, अविमुक्तेश्वरानंद आज खुलकर कांग्रेस के पक्ष में बोलते हैं। अनेक संत और शंकराचार्य उन्हें मान्यता देने पर अलग मत रखते हैं, फिर भी कांग्रेस को उनके समर्थन में कभी कोई समस्या दिखाई नहीं देती। लेकिन जैसे ही कोई संत सनातन, राष्ट्रवाद या भाजपा के किसी विचार के पक्ष में बोलता है, कांग्रेस के नेताओं को अचानक धर्मनिरपेक्षता खतरे में दिखने लगती है। यही कांग्रेस की वैचारिक विडंबना और दोहरी राजनीति है।
दरअसल कांग्रेस वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति में इतनी उलझ चुकी है कि उसे सनातन परंपरा से जुड़े हर प्रभावशाली चेहरे में राजनीतिक खतरा दिखाई देता है। यही कारण है कि संतों की विद्वता और तपस्या पर चर्चा कम होती है, और उन्हें किसी दल विशेष का चेहरा बताकर सीमित करने की कोशिश अधिक की जाती है। जबकि जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का व्यक्तित्व केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। वे शास्त्र, संस्कृत, वेद, रामायण और भारतीय संस्कृति के अद्वितीय विद्वान हैं। उनका ज्ञान ही उन्हें जगद्गुरु बनाता है, कोई राजनीतिक दल नहीं।
लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन संतों का अपमान कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश अंततः उसी दल को नुकसान पहुँचाती है जो ऐसा करता है। कांग्रेस को समझना होगा कि भारत केवल वोट बैंक की राजनीति से नहीं चलता, बल्कि उसकी आत्मा संतों, संस्कृति और आस्था में भी बसती है। जब-जब किसी दल ने इस भावना को समझने में भूल की है, जनता ने उसे समय आने पर जवाब भी दिया है।
राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संतों की गरिमा को कटघरे में खड़ा करना भारतीय परंपरा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस यदि वास्तव में लोकतांत्रिक और उदार राजनीति का दावा करती है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि संत किसी दल की जागीर नहीं होते — वे समाज की चेतना होते हैं।