रायपुर, 9 मार्च 2026। सेवानिवृत्त शासकीय कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल ऑडिट आपत्ति के आधार पर किसी कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभ रोके नहीं जा सकते। यदि विभागीय जांच में कर्मचारी के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं हुआ हो और कोई दंडादेश जारी नहीं किया गया हो, तो उसे या उसके परिजनों को सभी सेवानिवृत्ति लाभ देना अनिवार्य है। न्यायालय ने यह निर्णय सक्ती स्थित जवाहरलाल नेहरू महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य जी.एस. वर्मा से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिया। जी.एस. वर्मा 30 नवंबर 2009 को प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए थे, लेकिन उन्हें लंबे समय तक पेंशन और अन्य सेवा लाभ प्रदान नहीं किए गए।
वर्मा ने इस संबंध में उच्च स्तरीय पेंशन समिति के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसे समिति ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके खिलाफ ऑडिट आपत्ति दर्ज है। इसके बाद भी मामला लंबित रहा। इस दौरान वर्मा के निधन के बाद उनकी पत्नी मीरा वर्मा ने अधिवक्ता सुशोभित सिंह के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई। याचिका में बताया गया कि वर्मा के खिलाफ न तो कोई विधिवत विभागीय जांच हुई थी, न ही उन्हें आरोप पत्र जारी किया गया था और न ही किसी प्रकार का दंडादेश पारित किया गया था। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सभी दस्तावेजों का परीक्षण किया और पाया कि विधिसम्मत प्रक्रिया के बिना किसी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उच्च स्तरीय पेंशन समिति के निर्णय को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जी.एस. वर्मा के सभी सेवानिवृत्ति लाभ उनकी पत्नी मीरा वर्मा को प्रदान किए जाएं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक विभागीय जांच में दोष सिद्ध न हो, तब तक पेंशन, ग्रेच्युटी सहित अन्य सेवा लाभ रोकना कानूनन उचित नहीं है।