जामगांव आर । अंचल में सदियों पुरानी परंपरा ‘सवनाही तिहार’ इस वर्ष भी पूरी श्रद्धा, आस्था और अनुशासन के साथ मनाई जा रही है। सावन माह की पहली रविवार से शुरू हुए इस अनूठे तिहार में टोना-टोटका, बीमारी और भूत-प्रेत से गांव की रक्षा के लिए पूरे गांव में कामकाज पूर्ण रूप से बंद कर दिया जाता है।
सवना माह की “इतवारी छुट्टी” के रूप में यह परंपरा हर रविवार पांच से सात सप्ताह तक चलती है कई गांव में यह दशहरा तक भी जारी रहती है कोटवार द्वारा मुनादी के बाद गांव की रफ्तार थम जाती है, न कोई खेत जाता है, न कोई मवेशी खेतों में उतरता है। सामूहिक विश्वास और सामाजिक अनुशासन का यह उदाहरण वर्तमान दौर में भी पूरी निष्ठा से निभाया जाता है।
शनिवार रात गांव के बैगा देवस्थानों पर जागरण करते हैं। मध्य रात्रि को गांव की पूर्व दिशा की सरहद पर सवनाही देवी की पूजा होती है जिसमें नारियल, सिंदूर, नींबू, झंडे, नीम की लकड़ी की गाड़ी और काली मुर्गी जैसे प्रतीकों का उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि पूजा के बाद काली मुर्गी को सियार पार छोड़ना भूत-प्रेतों को शांत करने का प्रतीक है। पीछे मुड़कर देखने की मनाही, इस परंपरा की रहस्यमयता को और बढ़ा देती है।पूरे गांव में इस दिन गोबर से बनी मनुष्य आकृतियों और रेखाओं के माध्यम से घर की परिक्रमा की जाती है, जिसे अदृश्य शक्तियों से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।गांव में चंदा एकत्र कर पूजा का आयोजन, बैगा की दक्षिणा और अन्य व्यवस्थाएं की जाती हैं।
हालांकि यह परंपरा आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती, लेकिन सामुदायिक मनोबल, एकता और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण है। ‘सवनाही तिहार’ ग्रामीण जीवन के उस गहरे सांस्कृतिक पक्ष को जीवंत करता है जो परंपरा, प्रकृति और समाज के संतुलन में विश्वास रखता है।