
दस्तावेजों और गवाहों ने खोली सच्चाई; श्रम न्यायालय ने खारिज किया मुआवजा प्रकरण
बिलासपुर। एक निर्माण मजदूर की मौत के बाद 12 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा पाने के लिए खुद को उसकी पत्नी बताने वाली महिला की सच्चाई अदालत में उजागर हो गई। श्रम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि दावा करने वाली महिला मृतक की पत्नी नहीं, बल्कि उसकी मकान मालकिन थी। इसके बाद न्यायालय ने पूरे मुआवजा दावे को खारिज कर दिया। जानकारी के अनुसार वर्ष 2017 में सरकंडा क्षेत्र में निर्माणाधीन भवन की दूसरी मंजिल से गिरने के कारण रामेश्वर केवट की मौत हो गई थी। घटना के बाद गंगा बाई नामक महिला ने स्वयं को मृतक की पत्नी बताते हुए भवन मालिक और ठेकेदार के खिलाफ 8.06 लाख रुपये मुआवजा, 50 प्रतिशत पेनल्टी और ब्याज सहित कुल 12 लाख रुपये से अधिक की मांग की थी।
मामले में उस समय नया मोड़ आ गया जब प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि गंगा बाई मृतक की पत्नी नहीं है। इसके बाद न्यायालय ने मृतक की वास्तविक पत्नी धारमीन बाई और उसके बच्चों को भी पक्षकार बनाया। सुनवाई के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से स्पष्ट हुआ कि रामेश्वर केवट गंगा बाई के मकान में किरायेदार के रूप में रहता था। स्कूल रिकॉर्ड में भी गंगा बाई के बच्चों के पिता का नाम विजय राम साही दर्ज मिला, जिससे उसके दावे पर और सवाल खड़े हो गए। जांच में यह भी सामने आया कि मृतक और गंगा बाई के बीच वैध विवाह का कोई प्रमाण मौजूद नहीं था, जबकि मृतक की पहली पत्नी से तलाक का भी कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि गंगा बाई पहले ही प्रशासन से मृतक की मौत के संबंध में एक लाख रुपये की अनुग्रह सहायता राशि प्राप्त कर चुकी थी।
सभी दस्तावेजी साक्ष्यों, रिकॉर्ड और गवाहों के बयान का परीक्षण करने के बाद श्रम न्यायालय ने माना कि महिला मृतक की पत्नी होने का दावा साबित नहीं कर सकी। इसके चलते अदालत ने 12 लाख रुपये से अधिक का पूरा मुआवजा दावा निरस्त कर दिया। न्यायालय के इस फैसले को मुआवजा मामलों में सही जानकारी, वैध दस्तावेज और वास्तविक कानूनी संबंधों की पुष्टि के महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है।