स्रोत महोत्सव 2026 में नदी संरक्षण का रोडमैप तैयार करने पर जोर, मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण और जनभागीदारी होंगे अभियान के प्रमुख आधार! सीएम विष्णु देव साय बोले -“नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा”

स्रोत महोत्सव 2026 में नदी संरक्षण का रोडमैप तैयार करने पर जोर, मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण और जनभागीदारी होंगे अभियान के प्रमुख आधार! सीएम विष्णु देव साय बोले -“नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा”

रायपुर,20 अगस्त 2026। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता, संस्कृति, कृषि और समृद्धि की जीवनधारा हैं। “नदी बचेगी तो जल बचेगा और जल बचेगा तो जीवन बचेगा।” इसी भावना के साथ प्रदेश में नदियों के उद्गम स्थलों और कैचमेंट एरिया के संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए वैज्ञानिक तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और जनभागीदारी के समन्वय से प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जा रही है। मुख्यमंत्री श्री साय ने राजधानी रायपुर के ओमाया गार्डन में आयोजित ‘स्रोत महोत्सव 2026’ एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया। कार्यशाला का उद्देश्य प्रदेश की नदियों के उद्गम स्थलों एवं जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण, जल संचयन एवं भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देना तथा नदी संरक्षण को व्यापक जन अभियान का स्वरूप देना है।

पांच प्रमुख स्तंभों पर आगे बढ़ेगा नदी संरक्षण अभियान

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में नदी संरक्षण के लिए मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना पांच प्रमुख स्तंभ होंगे। प्रत्येक नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण किया जाएगा। नदी के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र, भू-उपयोग में बदलाव तथा प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारणों का अध्ययन किया जाएगा। इसके आधार पर वन एवं वनस्पति संरक्षण, मृदा क्षरण की रोकथाम, पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण एवं पुनर्जीवन, नई जल संग्रहण संरचनाओं के निर्माण और भू-जल पुनर्भरण जैसे कार्य किए जाएंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षाजल नदी तंत्र और भू-जल का मूल आधार है। बारिश के पानी को तेजी से बहकर निकलने देने के बजाय अधिक से अधिक मात्रा में धरती के भीतर पहुंचाने के उपाय करने होंगे। इससे भू-जल स्तर में सुधार के साथ जल स्रोतों के पुनर्जीवन और नदियों में लंबे समय तक जल प्रवाह बनाए रखने में मदद मिलेगी।

नदी संरक्षण को जन आंदोलन बनाने पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण का लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। नदी किनारे बसे गांवों और स्थानीय समुदायों को नदी संरक्षण की प्रक्रिया का प्रमुख भागीदार बनाना होगा। उन्होंने जिला स्तरीय समितियों से नदी किनारे बसे गांवों में स्थानीय समितियां गठित कर पंचायतों के सहयोग से संरक्षण एवं पुनरुद्धार के कार्य आगे बढ़ाने का आह्वान किया। साथ ही विशेषज्ञों से वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान को सरल भाषा में आम लोगों तक पहुंचाने की अपील की।

जल संरक्षण के लिए दो महत्वपूर्ण एमओयू

कार्यक्रम में जल संरक्षण के क्षेत्र में संस्थागत और तकनीकी क्षमता मजबूत करने के लिए दो महत्वपूर्ण एमओयू किए गए। नेशनल वाटर एकेडमी, पुणे के साथ हुए समझौते से जल संरक्षण एवं जल प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और मैदानी अमले के प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिलेगा। वहीं एंट्रिक्स कॉरपोरेशन, बेंगलुरु के साथ एमओयू के माध्यम से आधुनिक भू-स्थानिक तकनीकों का उपयोग जल संसाधनों के वैज्ञानिक विश्लेषण एवं निगरानी में किया जाएगा। प्रारंभिक चरण में कुनकुरी तहसील के लगभग 1540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में आधुनिक तकनीक से जल संसाधनों की स्थिति का अध्ययन, निगरानी और विश्लेषण किया जाएगा।

‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन

मुख्यमंत्री श्री साय ने कार्यक्रम में जल संरक्षण पर आधारित ‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन भी किया। पुस्तक में नीर की रक्षा, नारी की भागीदारी और जल संपदा के संरक्षण की अवधारणा को रेखांकित करते हुए जल प्रबंधन, संरक्षण के प्रयासों और नवाचारों का दस्तावेजीकरण किया गया है।

साइट स्पेसिफिक और साइंस बेस्ड समाधान तैयार होंगे

जल संसाधन विभाग के सचिव श्री राजेश सुकुमार टोप्पो ने बताया कि कार्यशाला में नौ नदी समूहों पर अलग-अलग चर्चा की जा रही है। क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप साइट स्पेसिफिक और साइंस बेस्ड समाधान तैयार किए जाएंगे। इनमें समस्या की पहचान, समाधान, क्रियान्वयन की जिम्मेदारी और परिणामों के आकलन की समय-सीमा निर्धारित करने पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण केवल अधोसंरचना निर्माण का विषय नहीं है। स्थानीय समुदाय की भागीदारी ही संरक्षण कार्यों की दीर्घकालिक सफलता और स्थायित्व की कुंजी है। कार्यशाला से प्राप्त सुझावों के आधार पर छत्तीसगढ़ के लिए समयबद्ध रिवर सोर्स रेस्टोरेशन रोडमैप तैयार करने की दिशा में कार्य किया जाएगा।

सीगंगा के संस्थापक एवं आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे ने भी जल सुरक्षा के लिए नदियों के उद्गम और उन्हें पोषित करने वाले जल स्रोतों के संरक्षण को जरूरी बताया। उन्होंने प्राचीन ज्ञान, स्थानीय अनुभव और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के समन्वय पर जोर दिया। कार्यशाला में नमामि गंगे मिशन से जुड़े विषय विशेषज्ञ, एनआईटी रायपुर के प्राध्यापक, राज्य एवं जिला स्तरीय समितियों के सदस्य, विभिन्न जिलों के कलेक्टर एवं अधिकारी तथा जल एवं नदी संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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